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श्रावण में उपवास का महत्त्व
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श्रावण में उपवास का महत्त्व
**(श्रावण मास : 4 जुलाई से 31 अगस्त)*
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भारतीय संस्कृति में पर्व और त्यौहारों की बड़ी सुंदर व्यवस्था की गयी है । श्रावण मास में उपवास का महत्त्व अधिक है क्योंकि इस महीने में धरती पर सूर्य की किरणें कम पड़ती हैं जिससे पाचनतंत्र कमजोर होता है । अगर इन दिनों में अधिक भोजन किया जाय तो अपच और अजीर्ण हो सकता है, जिसके फलस्वरूप बुखार आने की संभावना रहती है । इसीलिए श्रावण मास में एक बार खाने का विधान किया गया है ।*
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्यौहारों की बड़ी सुंदर व्यवस्था की गयी है । श्रावण मास में उपवास का महत्त्व अधिक है क्योंकि इस महीने में धरती पर सूर्य की किरणें कम पड़ती हैं जिससे पाचनतंत्र कमजोर होता है । अगर इन दिनों में अधिक भोजन किया जाय तो अपच और अजीर्ण हो सकता है, जिसके फलस्वरूप बुखार आने की संभावना रहती है । इसीलिए श्रावण मास में एक बार खाने का विधान किया गया है ।**
अन्न में मादकता होती है । इसमें भी एक प्रकार का नशा होता है । भोजन के बाद आलस्य के रूप में इस नशे का प्रायः सभी लोग अनुभव करते हैं । पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव शक्ति निहित होती है, जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती है । इस शक्ति को शास्त्रकारों ने ‘आधिभौतिक शक्ति’ कहा है ।*
अन्न में मादकता होती है । इसमें भी एक प्रकार का नशा होता है । भोजन के बाद आलस्य के रूप में इस नशे का प्रायः सभी लोग अनुभव करते हैं । पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव शक्ति निहित होती है, जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती है । इस शक्ति को शास्त्रकारों ने ‘आधिभौतिक शक्ति’ कहा है ।**
इस शक्ति की प्रबलता से वह ‘आध्यात्मिक शक्ति’ जो हम पूजा-उपासना के माध्यम से एकत्र करना चाहते हैं, नष्ट हो जाती है । अतः भारतीय महर्षियों ने सम्पूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास का प्रथम स्थान रखा है ।*
इस शक्ति की प्रबलता से वह ‘आध्यात्मिक शक्ति’ जो हम पूजा-उपासना के माध्यम से एकत्र करना चाहते हैं, नष्ट हो जाती है । अतः भारतीय महर्षियों ने सम्पूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास का प्रथम स्थान रखा है ।* *विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।*
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गीता के अनुसार उपवास विषय-वासना से निवृत्ति का अचूक साधन है । अतः शरीर, इन्द्रियों और मन पर विजय पाने के लिए ‘जितासन’ और ‘जिताहार’ होने की परम आवश्यकता है ।*
गीता के अनुसार उपवास विषय-वासना से निवृत्ति का अचूक साधन है । अतः शरीर, इन्द्रियों और मन पर विजय पाने के लिए ‘जितासन’ और ‘जिताहार’ होने की परम आवश्यकता है ।**
‘अर्ध रोगहरि निद्रा सर्व रोगहरि क्षुधा’ के अनुसार आयुर्वेद तथा आज का विज्ञान – दोनों का एक ही निष्कर्ष है कि व्रत और उपवासों से जहाँ अनेक शारीरिक व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं, वहीं मानसिक व्याधियों के शमन का भी यह एक अमोघ उपाय है । इसलिए भूख से थोड़ा कम खाने का और कभी-कभी उपवास करने का विधान है । उपवास अर्थात् पूरे दिन गुनगुने (न ठंडा न विशेष गर्म) पानी के सिवाय कुछ भी नहीं खायें-पियें ।*
‘अर्ध रोगहरि निद्रा सर्व रोगहरि क्षुधा’ के अनुसार आयुर्वेद तथा आज का विज्ञान – दोनों का एक ही निष्कर्ष है कि व्रत और उपवासों से जहाँ अनेक शारीरिक व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं, वहीं मानसिक व्याधियों के शमन का भी यह एक अमोघ उपाय है । इसलिए भूख से थोड़ा कम खाने का और कभी-कभी उपवास करने का विधान है । उपवास अर्थात् पूरे दिन गुनगुने (न ठंडा न विशेष गर्म) पानी के सिवाय कुछ भी नहीं खायें-पियें ।**
१५ दिन में १ दिन एकादशीको व्रत रखना ही चाहिए । इससे आमाशय, यकृत और पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है तथा उनकी स्वतः ही सफाई हो जाती है । इस प्रक्रिया से पाचनतंत्र मजबूत हो जाता है तथा व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति, मानसिक शक्ति के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है ।*
१५ दिन में १ दिन एकादशीको व्रत रखना ही चाहिए । इससे आमाशय, यकृत और पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है तथा उनकी स्वतः ही सफाई हो जाती है । इस प्रक्रिया से पाचनतंत्र मजबूत हो जाता है तथा व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति, मानसिक शक्ति के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है ।*
