पिता ने बचपन में ही जिम में डाला, खेल से भागते रहे, पहला नेशनल गेम्स जीता तब गंभीर हुए, अब उनके तराशे खिलाड़ी निकाल रहे सोना

खेलों में छत्तीसगढ़ के पहले राष्ट्रीय पदक विजेता रुस्तम सारंग का सफर आमिर खान स्टारर फिल्म “दंगल” की कहानी जैसा है। पिता ने देश के लिए ओलिम्पिक गोल्ड का सपना देखा। बच्चों को जिम में डाला। वेटलिफ्टिंग से ध्यान न भटके इसलिए कठोर अनुशासन लागू किया। रुस्तम खेल से भागते रहे, लेकिन पिता से नहीं भाग पाए। जब पहला नेशनल गोल्ड मेडल जीता तब गंभीर हुए। उसके बाद नेशनल, इंटरनेशनल चैंपियनशिप्स में कई गोल्ड जीते। अब रायपुर के सतनामीपारा के जुगाड़ की जिम में उनके तराशे हुए खिलाड़ी विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में सोना निकाल रहे हैं।

दैनिक भास्कर से एक्सक्लूसिव बातचीत में रुस्तम सारंग ने बताया, “उनके पिता और कोच बुधराम सारंग ने 1987-88 में वेटलिफ्टिंग शुरू किया था। 1991-92 में उन्होंने नेशनल मेडल जीता। 1993 में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें विक्रम अवार्ड दिया था। वे गुढ़ियारी बाजार में पल्लेदारी करते थे, बढ़ई का काम करते। बाद में खेल कोटे में कलेक्टोरेट में चपरासी की नौकरी मिल गई। उन्होंने ओलिम्पिक में गोल्ड का सपना देखा था। यह सपना उन्होंने हमारे जेहन में भी डालने की कोशिश की।”

रुस्तम बताते हैं कि “12 साढे 12 साल की उम्र में उनपर जिम का अनुशासन लाद दिया। 6 से 9 बजे तक जिंदगी जिम तक सिमट गई। घूमने-फिरने यहां तक की रिश्तेदारियों में जाने तक की मनाही थी। मुझे इससे चिढ़ लगती थी। मैं इस खेल से भागता था। बहाने बनाता था। लेकिन पिता ने साफ कर दिया कि यही करना है। 2003 में नेशनल यूथ चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता। इससे सम्मान मिला तब समझ में आया कि अब यही जिंदगी जीना है।”

उसके बाद भारत के वेटलिफ्टिंग को रुस्तम मिला, जिसने एक के बाद कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में देश के लिए मेडल जीते। रुस्तम अभी छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल में कंपनी कमांडर हैं और अपने नेशनल चैंपियन भाई अजयदीप सारंग के साथ छत्तीसगढ़ में वेटलिफ्टिंग की नई पौध को सींच रहे हैं।

साइकिल मरम्मत किया, पेपर बेचे लेकिन सपना नहीं छोड़ा

अभावों के बीच घर की जरूरतों और सपनों को पूरा करने के लिए रुस्तम और उनके भाई अजयदीप ने हर जतन किए। साइकिल मरम्मत की दुकान पर काम किया, अखबार बेचे, टेलिफोन बूथ पर काम किया। अजयदीप ने लकड़ी के सामान बनाकर गांव-गांव बेचे। पढ़ाई की और खेल की ट्रेनिंग में पसीना बहाया लेकिन सपने को पीछे नहीं छोड़ा।

छत्तीसगढ़ के लिए सेना को बोल दिया था ना

रुस्तम बताते हैं 2004 के नेशनल गेम्स में सिल्वर जीता। 2005 में एशियन गेम्स में मेडल अाया। 2005 में ही उन्हें आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीस्च्यूट से प्रस्ताव आया था। वे चले भी गए। दो महीने बाद उनको पता चला कि यहां प्रशिक्षण के बाद उन्हें गेम्स में छत्तीसगढ़ का नहीं सैन्य बलों का प्रतिनिधित्व करना है। छत्तीसगढ़ से ही खेलने की जिद थी तो सेना में कहीं बेहतर खेल प्रशिक्षण का अवसर ठुकराकर अपने छोटे से जिम में वापस आ गए।

व्यायामशाला में अभी सीनियर नेशनल पर फोकस

सतनामीपारा की घनी बस्ती के बीच सारंग बंधुओं की छोटी सी व्यायामशाला में इन दिनों सुबह 5 बजे से खटपट की आवाज गूंजने लगती है। यहां तीन सत्रों में 50 खिलाड़ियों का प्रशिक्षण चल रहा है। इनमें दो लड़कियां भी हैं। रुस्तम कहते हैं अभी उनका फोकस बच्चों को आने वाली सीनियर नेशनल प्रतियोगिता में मेडल जीतने का है। उन्होंने उम्मीद जताई कि छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी नेशनल गेम्स में मेडल लेकर लौटेंगे।

दिल्ली में 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में प्रदर्शन करते रुस्तम, इस टुर्नामेंट में वे तकनीकी वजहों से पदक से चूक गए थे।
दिल्ली में 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में प्रदर्शन करते रुस्तम, इस टुर्नामेंट में वे तकनीकी वजहों से पदक से चूक गए थे।

एक नजर में रुस्तम की उपलब्धियां

2006 – जूनियर नेशनल चैंम्पियनशिप में गोल्ड

2006 – सीनियर नेशनल चैम्पियनशिप में ब्रांज

2006 – नेशनल गेम्स गुवाहाटी में सिल्वर

2007 – ऑल इंडिया पुलिस गेम्स में गोल्ड

2009 – कॉमनवेल्थ चैम्पियनशिप, मलेशिया में गोल्ड

2011 और 2014 – ओलिम्पिक के लिए क्वालिफाई किया

2014 – वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड

2015 – केरल नेशनल गेम्स में गोल्ड

छत्तीसगढ़ का सर्वोच्च खेल अलंकरण

छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से खेलों के लिए दिए जाने वाले तीनों बड़े सम्मान रुस्तम सारंग को मिल चुके हैं। इसमें 2006-7 का शहीद कौशल यादव खेल पुरस्कार, 2007-8 का शहीद राजीव पाण्डेय खेल पुरस्कार और 2009-10 का गुंडाधुर सम्मान शामिल हैं।