पिछले सात दिनों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में 4.5 या उससे अधिक तीव्रता के 187 भूकंप दर्ज किए गए हैं। इनमें कई झटके प्रशांत महासागर के आसपास स्थित ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में आए हैं। जापान, इंडोनेशिया, अलास्का और अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में भूकंप की गतिविधियों ने एक बार फिर इस संवेदनशील इलाके को चर्चा में ला दिया है। इस दौरान इंडोनेशिया के पास 7.7 तीव्रता का भूकंप सबसे बड़ा रहा। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टि से सिर्फ भूकंपों की संख्या के आधार पर किसी बड़े भूकंप की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है।
क्या है ‘रिंग ऑफ फायर’
‘रिंग ऑफ फायर’ प्रशांत महासागर के चारों ओर फैला करीब 40 हजार किलोमीटर लंबा भूकंपीय क्षेत्र है। यहां कई टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे के संपर्क में हैं और लगातार गति करती रहती हैं। प्लेटों की इसी गतिविधि के कारण इस क्षेत्र में भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट अपेक्षाकृत अधिक होते हैं। जापान, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड, अलास्का और अमेरिका का पश्चिमी तट इसी व्यापक भूकंपीय क्षेत्र से जुड़े हैं। दुनिया के करीब 90 फीसदी भूकंप इसी क्षेत्र के आसपास आने का अनुमान लगाया जाता है।

एक हफ्ते में कई बड़े झटके
पिछले एक सप्ताह में इंडोनेशिया के पास 7.7 तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ। इसके अलावा उत्तरी इंडोनेशिया में 6.9 और दक्षिणी पेरू में 6.7 तीव्रता का भूकंप आया। जापान, अलास्का और अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों में भी 4.5 या उससे अधिक तीव्रता के कई झटके महसूस किए गए। किसी बड़े भूकंप के बाद छोटे झटकों का सिलसिला जारी रह सकता है, जिन्हें आफ्टरशॉक कहा जाता है।
187 भूकंप किसी बड़े खतरे का संकेत हैं
सिर्फ सात दिनों में आए 187 भूकंपों के आंकड़े को किसी बड़े भूकंप की सीधी चेतावनी मानना सही नहीं होगा। खास बात यह है कि यह आंकड़ा पूरी दुनिया में 4.5 या उससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों का है, सिर्फ रिंग ऑफ फायर क्षेत्र का नहीं। वैज्ञानिक अभी भूकंप की सटीक तारीख, स्थान और तीव्रता की पहले से भविष्यवाणी नहीं कर सकते। इसलिए भूकंपों की संख्या बढ़ने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जल्द कोई बड़ा भूकंप आने वाला है।
भूकंपों पर क्यों बनी हुई है नजर
कैलिफोर्निया, तुर्की और प्रशांत महासागर के आसपास के कई इलाके पहले से ही सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में आते हैं। यहां प्लेटों की गतिविधि के कारण भूकंप का जोखिम लगातार बना रहता है। इसलिए 187 भूकंपों का आंकड़ा निश्चित तौर पर ध्यान खींचता है, लेकिन इससे किसी बड़ी आपदा की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। वैज्ञानिक इन गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं और बड़े झटकों के बाद आफ्टरशॉक की संभावना का आकलन करते हैं।
