हेमचंद यादव विवि कुलपति पर शिकायतों की जांच

हेमचंद यादव विवि कुलपति पर शिकायतों की जांच

दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी के खिलाफ मिली वित्तीय, प्रशासनिक और मूल्यांकन संबंधी शिकायतों की जांच अब आगे बढ़ गई है। राज्यपाल सचिवालय की ओर से दस्तावेज और अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए तय समय-सीमा समाप्त होने के बाद उच्चस्तरीय जांच समिति विश्वविद्यालय पहुंची है। समिति द्वारा विश्वविद्यालय में संबंधित नस्तियों, नोटशीट और अन्य अभिलेखों की मौके पर जांच-पड़ताल किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्तर पर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं।

राज्यपाल ने गठित की थी उच्चस्तरीय जांच समिति

कुलपति के खिलाफ प्राप्त शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ने उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया था। राज्यपाल के सचिव डॉ. सीआर प्रसन्ना ने 30 जुलाई 2026 को इस संबंध में आदेश जारी किया था। बताया गया है कि दुर्ग ग्रामीण विधायक और छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष ललित चंद्राकर ने कुलपति के खिलाफ विभिन्न बिंदुओं को लेकर कुलाधिपति के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी। इसके बाद शिकायतों की जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।

दस्तावेज उपलब्ध कराने की समय-सीमा हुई समाप्त

विश्वविद्यालय सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल सचिवालय ने 19 अगस्त 2026 के पत्र के जरिए जांच समिति के लिए आवश्यक दस्तावेज, नस्तियां और अभिलेख उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इसके लिए पहले 24 अगस्त 2026 तक की समय-सीमा निर्धारित की गई थी। बताया जाता है कि कुलपति की ओर से विभिन्न विभागों से रिकॉर्ड जुटाने और उच्च शिक्षा विभाग से संबंधित जानकारी के लिए आरटीआई आवेदन किए जाने का हवाला देते हुए समय-सीमा को बढ़ाकर 31 अगस्त 2026 करने का अनुरोध किया गया था। निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद भी अपेक्षित दस्तावेज जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जाने की बात सामने आई। इसके बाद समिति के विश्वविद्यालय पहुंचकर अभिलेखों की जांच करने का घटनाक्रम सामने आया है।

विधायक ने लगाए कई गंभीर आरोप

ललित चंद्राकर की ओर से राज्यपाल को भेजे गए शिकायत पत्र में विश्वविद्यालय में कथित वित्तीय, प्रशासनिक और शैक्षणिक अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। शिकायत में मार्च 2026 में 12 लाख से अधिक उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी के लिए आमंत्रित निविदा का भी उल्लेख है। आरोप है कि शासकीय फर्म ‘संवाद’ ने न्यूनतम दर प्रस्तुत की थी, इसके बावजूद कुलपति की ओर से एक निजी फर्म के पक्ष में अर्धशासकीय पत्र जारी कर कार्य आवंटित करने की अनुशंसा की गई। शिकायत के अनुसार बाद में इसी फर्म को काम दिया गया और 40 लाख रुपये से अधिक का भुगतान किया गया।

नए पाठ्यक्रम और पुस्तकों की खरीदी पर भी सवाल

शिकायत में विश्वविद्यालय में एमबीए, एमसीए और पीजीडीबीएम समेत 8 नए पाठ्यक्रम शुरू करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि एआईसीटीई और आरसीआई से निरीक्षण कराने से पहले राज्य शासन से आवश्यक अनुमति नहीं ली गई। इसके अलावा शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि नए पाठ्यक्रमों के लिए करीब 40 लाख रुपये की 380 पुस्तकों की खरीदी बिना विधिवत निविदा प्रक्रिया के मौखिक निर्देश पर की गई। पुस्तकों की कीमत और खरीदी प्रक्रिया को लेकर भी जांच की मांग की गई है।

अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर भी शिकायत

शिकायत में यह भी कहा गया है कि शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले ही मई माह में पांच विषयों के लिए 15 अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई। शिकायतकर्ता के अनुसार, संबंधित विभाग उस समय विधिवत अस्तित्व में नहीं थे और उनमें विद्यार्थियों का प्रवेश भी नहीं हुआ था। ऐसे में नियुक्तियों के औचित्य और वेतन भुगतान के स्रोत की जांच की मांग की गई है।

कार्यपरिषद की मंजूरी को लेकर भी उठे सवाल

कुलपति पर विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण वित्तीय और अन्य मामलों को कार्यपरिषद के समक्ष अनुमोदन के लिए प्रस्तुत नहीं करने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि निर्धारित सीमा से अधिक की खरीदी और वित्तीय निर्णयों के लिए कार्यपरिषद की स्वीकृति आवश्यक होती है। उच्चस्तरीय जांच समिति के विश्वविद्यालय पहुंचने के बाद इन शिकायतों से जुड़े दस्तावेजों और अभिलेखों की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति और जिम्मेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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