वैज्ञानिकों की एक रिसर्च में इंसानों के विकास से जुड़ी एक दिलचस्प परिकल्पना सामने आई है। शोधकर्ताओं ने इंसानों के पूर्वजों में मौजूद एक प्राचीन मध्य वाली आंख (Median Eye) और आज इंसान के शरीर में मौजूद पिनियल ग्लैंड के बीच विकासवादी संबंध का अध्ययन किया है।
शोध के मुताबिक, लाखों साल पहले इंसानों के पूर्वजों में सिर के बीचों-बीच एक ऐसी प्रकाश-संवेदनशील संरचना मौजूद थी, जिसे शोधकर्ता Composite Ancestral Median Eye से जोड़ते हैं। समय के साथ इस संरचना में विकासवादी बदलाव हुए और इसके अलग-अलग हिस्सों के वर्तमान आंखों तथा पिनियल ग्लैंड से संबंध की बात सामने आई है।
क्या इंसानों में सचमुच थी तीसरी आंख?
रिसर्च में जिस ‘तीसरी आंख’ की बात की गई है, वह आज इंसान के चेहरे पर मौजूद किसी अतिरिक्त आंख की तरह नहीं थी। यह एक मध्य वाली प्रकाश-संवेदनशील संरचना थी, जो प्राचीन जीवों के लिए रोशनी, दिन-रात के चक्र और दिशा से जुड़ी जानकारी हासिल करने में मदद करती थी।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, समय के साथ इस प्राचीन संरचना में बदलाव हुए। इसका मध्य वाला हिस्सा पिनियल ग्लैंड से जुड़ा माना गया है, जबकि दूसरे हिस्सों के विकास को आंखों और रेटिना से जोड़ा गया है।
50 करोड़ साल पहले समुद्री जीव थे पूर्वज
शोध में बताया गया है कि करीब 50 करोड़ साल पहले इंसानों के बहुत पुराने पूर्वज समुद्री जीवों के रूप में मौजूद थे। ये जीव अंधेरे और कीचड़ वाले वातावरण में रहते थे।
ऐसे वातावरण में उनकी आंखों के लिए प्रकाश की जानकारी हासिल करना चुनौतीपूर्ण था। शोधकर्ताओं के अनुसार, सिर के बीच मौजूद मध्य वाली प्रकाश-संवेदनशील संरचना उनके लिए दिन-रात और दिशा से जुड़ी जानकारी हासिल करने में उपयोगी रही होगी।
बाद में जब इन जीवों के रहने का वातावरण बदला और वे सुरंगों या अधिक अंधेरे स्थानों में रहने लगे, तो उनकी बगल वाली आंखों की उपयोगिता कम होती गई। वहीं मध्य वाली संरचना के बने रहने को शोधकर्ता उसके अलग कार्य से जोड़ते हैं।
पिनियल ग्लैंड कैसे जुड़ी है इस कहानी से?
पिनियल ग्लैंड इंसान के मस्तिष्क के बीच स्थित एक छोटी ग्रंथि है। यह सीधे देखने वाली आंख नहीं है, लेकिन शरीर की जैविक घड़ी से जुड़े काम में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।
यह ग्रंथि मेलाटोनिन हार्मोन के निर्माण से जुड़ी है। रात में मेलाटोनिन का स्तर बढ़ने से शरीर को नींद के समय से संबंधित संकेत मिलते हैं। इसी प्रक्रिया का संबंध शरीर के 24 घंटे के सर्कैडियन रिदम से है।
शोध में इसी मौजूदा भूमिका को प्राचीन प्रकाश-संवेदनशील संरचना के विकास से जोड़कर देखा गया है।
शोधकर्ताओं ने कैसे किया अध्ययन?
इस रिसर्च में कोई नया प्रयोग करने के बजाय शोधकर्ताओं ने पहले से उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारियों का विश्लेषण किया। इसमें मछलियों, लैंप्री और अन्य जीवों के आनुवंशिक डेटा, जीवाश्मों और मौजूदा अध्ययनों को शामिल किया गया।
शोधकर्ताओं ने इन जानकारियों के आधार पर यह समझने की कोशिश की कि आंखों और पिनियल ग्लैंड से जुड़ी संरचनाओं का विकास किस तरह हुआ होगा।
आज भी कुछ जीवों में दिखती है ‘तीसरी आंख’
रिसर्च में न्यूजीलैंड में पाए जाने वाले टुआतारा का उदाहरण भी दिया गया है। यह एक सरीसृप है, जिसके सिर के ऊपरी हिस्से में एक छोटी प्रकाश-संवेदनशील आंख जैसी संरचना मौजूद होती है।
इस संरचना में लेंस और रेटिना जैसे हिस्से पाए जाते हैं। इसे प्राचीन मध्य वाली आंख की अवधारणा को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।
नींद और शरीर की घड़ी से क्या है संबंध?
आज इंसानों में पिनियल ग्लैंड प्रकाश को सीधे आंख की तरह महसूस नहीं करती। हालांकि, आंखों से मिलने वाले प्रकाश और अंधेरे के संकेत शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करते हैं और इसी प्रक्रिया में पिनियल ग्लैंड तथा मेलाटोनिन की भूमिका होती है।
इस तरह शोधकर्ताओं की यह परिकल्पना इंसानी आंखों और शरीर की जैविक घड़ी के विकास को एक प्राचीन विकासवादी इतिहास से जोड़कर देखने की कोशिश करती है। हालांकि ‘तीसरी आंख’ शब्द यहां प्राचीन मध्य वाली प्रकाश-संवेदनशील संरचना के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, न कि इंसान में आज किसी अतिरिक्त देखने वाली आंख के मौजूद होने के अर्थ में।
