इंसानों की तरह सांप की भी हुई सर्जरी…

इंसानों की तरह सांप की भी हुई सर्जरी…

नाग पंचमी को आमतौर पर नाग देवता की पूजा और सर्पों के प्रति आस्था के पर्व के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह दिन प्रकृति और वन्यजीवों के संरक्षण का संदेश देने का अवसर भी है। इसी मौके पर करीब छह साल पुरानी एक ऐसी कहानी सामने आती है, जिसमें एक पशु चिकित्सक ने गंभीर रूप से घायल अहिराज यानी बैंडेड करैत की जटिल सर्जरी कर उसकी जान बचाई थी। इस ऑपरेशन में सांप की टूटी हुई रीढ़ को दोबारा सही स्थिति में लाकर स्टेनलेस स्टील वायर से स्थिर किया गया और करीब 12 टांके लगाए गए। ऑपरेशन के कुछ ही दिनों बाद अहिराज को उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया गया।

जब घायल हालत में डॉक्टर के पास पहुंचा अहिराज

यह मामला 18 जून 2020 का है। बिलासपुर के सर्पमित्र बब्बू सोनी एक गंभीर रूप से घायल अहिराज को लेकर तत्कालीन संयुक्त संचालक, पशु चिकित्सा सेवाएं, बिलासपुर के कार्यालय पहुंचे थे। जांच के दौरान डॉ. आर.एम. त्रिपाठी ने पाया कि सांप की रीढ़ की हड्डी टूट चुकी थी। चोट इतनी गंभीर थी कि उसका पिछला हिस्सा लगभग काम करना बंद कर चुका था। हालांकि सिर और शरीर का अगला हिस्सा अभी भी सक्रिय था। सर्प की हालत देखकर उसके बचने की संभावना बेहद कम लग रही थी। लेकिन डॉक्टर ने उसे मृत मानकर छोड़ने के बजाय उपचार का प्रयास करने का फैसला किया।

टूटी रीढ़ को सही जगह रखते ही दिखी उम्मीद

जांच के दौरान जब डॉक्टर ने टूटी हुई रीढ़ को उसकी सामान्य स्थिति में लाने की कोशिश की, तो अहिराज के पिछले हिस्से में हलचल दिखाई दी। यही वह क्षण था जब डॉक्टर को उम्मीद जगी कि सर्जरी के जरिए इस वन्यजीव की जान बचाई जा सकती है। इसके बाद घायल अहिराज को डॉ. एस.पी. सिन्हा के क्लीनिक ले जाया गया, जहां ऑपरेशन की तैयारी शुरू की गई।

करीब एक घंटे चली सर्जरी, स्टील वायर से जोड़ी रीढ़

ऑपरेशन से पहले घाव को अच्छी तरह साफ किया गया। इसके बाद 2 प्रतिशत जाइलोकैन से लोकल एनेस्थीसिया दिया गया। टूटी हुई वर्टिब्रा को उसकी सही जगह पर रिपोजिशन किया गया। इसके बाद रीढ़ की हड्डियों में ड्रिल की मदद से छोटे छेद किए गए और उन्हें स्टेनलेस स्टील वायर से बांधकर स्थिर किया गया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य रीढ़ के हिस्से को स्थिर रखना था, ताकि चोट ठीक होने की दिशा में आगे बढ़ सके। इसके बाद मांसपेशियों और त्वचा को टांकों से बंद किया गया तथा घाव पर दवा और पट्टी की गई। पूरी शल्यक्रिया करीब एक घंटे तक चली और लगभग 12 टांके लगाए गए। ऑपरेशन के बाद अहिराज में दोबारा जीवन के संकेत दिखाई देने लगे।

तीन दिन बाद जंगल में छोड़ा गया

सर्जरी के बाद अहिराज की निगरानी और देखभाल की गई। करीब तीन दिन बाद उसकी स्थिति बेहतर होने पर सर्पमित्र बब्बू सोनी ने उसे उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित छोड़ दिया। चूंकि अहिराज एक वन्यजीव है, इसलिए उपचार का उद्देश्य उसे स्थायी रूप से अपने पास रखना नहीं था। लक्ष्य था कि उसकी जान बचाई जाए और स्वस्थ होने के बाद उसे वापस प्रकृति में छोड़ दिया जाए।

पहले भी कोबरा का कर चुके हैं उपचार

डॉ. आर.एम. त्रिपाठी के लिए यह सर्प की सर्जरी का पहला अनुभव नहीं था। इससे पहले वह एक कोबरा का भी उपचार कर चुके थे। जिस समय अहिराज का ऑपरेशन किया गया, उसकी उम्र करीब चार वर्ष और लंबाई लगभग चार से साढ़े चार फीट बताई गई थी। गंभीर चोट के बावजूद उसका उपचार सफल होना वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील चिकित्सा दृष्टिकोण का उदाहरण माना गया। हालांकि इसे छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा मामला बताए जाने का दावा किया जाता है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर स्पष्ट नहीं है।

सांप इंसान का दुश्मन नहीं

डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक, सांप सामान्य परिस्थितियों में इंसानों पर हमला नहीं करते। जब उन्हें छेड़ा जाता है या अनजाने में उन पर पैर पड़ जाता है, तो वे अपनी सुरक्षा के लिए काट सकते हैं। सांप पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। वे खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों और दूसरे छोटे जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसलिए किसी सांप के दिखाई देने पर उसे मारने के बजाय प्रशिक्षित सर्पमित्र या संबंधित वन्यजीव बचाव टीम की मदद लेनी चाहिए।

नाग पंचमी पर मिला बड़ा संदेश

करीब छह साल पहले हुई यह घटना आज भी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। एक ऐसे जीव को, जिसे देखकर आमतौर पर लोगों में डर पैदा होता है, डॉक्टर ने इलाज के योग्य एक जिंदगी के रूप में देखा। करीब एक घंटे की सर्जरी, 12 टांके और स्टेनलेस स्टील वायर की मदद से टूटी रीढ़ को स्थिर करने के बाद अहिराज को नई जिंदगी मिली। कुछ दिनों बाद वही सांप फिर जंगल में लौट गया। आज डॉ. आर.एम. त्रिपाठी पशु चिकित्सा सेवाएं विभाग, मुंगेली में उप संचालक के पद पर पदस्थ हैं। उनकी यह पहल बताती है कि संवेदना और चिकित्सा सेवा केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। वन्यजीवों के प्रति जिम्मेदारी और संरक्षण की भावना भी प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते का अहम हिस्सा है।

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