परिक्रमा या फिर प्रदक्षिणा, जानिए वैज्ञानिक रहस्य

परिक्रमा क्यों 🔹?*

*🔹 भगवत्प्राप्त संत-महापुरुष के व्यासपीठ या निवास स्थान की, उनके द्वारा शक्तिपात किये हुए वट या पीपल वृक्ष की, महापुरुषों के समाधि स्थल अथवा किसी देव प्रतिमा की किसी कामना या संकल्पपूर्ति हेतु जो परिक्रमा (प्रदक्षिणा) की जाती है उसके पीछे अत्यंत सूक्ष्म रहस्य छिपे हैं । इसके द्वारा मानवी मन की श्रद्धा समर्पण की भावना का सदुपयोग करते हुए उसे अत्यंत प्रभावशाली ‘आभा विज्ञान’ का लाभ दिलाने की सुंदर व्यवस्था हमारी संस्कृति में है ।*

*🔹प्रदक्षिणा में छिपे वैज्ञानिक रहस्य🔹*

*🔹देवमूर्ति व ब्रह्मनिष्ठ संत-महापुरुषों के चारों तरफ दिव्य आभामंडल होता है । वैसे तो हर व्यक्ति के शरीर से एक आभा (aura) निकलती है किंतु ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष का आभामंडल दूर-दूर तक फैला होता है । यदि वे महापुरुष कुंडलिनी योग के अनुभवनिष्ठ योगी भी हों तो उनका आभामंडल इतना व्यापक होता है कि उसे नापने में यंत्र भी असमर्थ हो जाते हैं । ऐसे आत्मारामी संत जहाँ साधना करते हैं, निवास करते हैं वह स्थल उनकी दिव्य आभा से, उनके शरीर से निकलनेवाली दिव्य सूक्ष्म तरंगों से सुस्पंदित, ऊर्जा-सम्पन्न हो जाता है । इस कारण ऐसे महापुरुष की परिक्रमा करने से तो लाभ होता ही है, साथ ही उनके सान्निध्य से सुस्पंदित स्थानों की भी परिक्रमा से हमारे अंदर आश्चर्यजनक उन्नतिकारक परिवर्तन होने लगते हैं ।*

*🔹प्रदक्षिणा 🔹*

*🔹 प्र + दक्षिणा अर्थात् दक्षिण (दायीं दिशा) की ओर फेरे करना । परिक्रमा सदैव अपने बायें हाथ की ओर से दायें हाथ की ओर ही की जाती है क्योंकि दैवी शक्ति के आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है । इसकी विपरीत दिशा में परिक्रमा करने से उक्त आभामंडल की तरंगों और हमारी स्वयं की आभा-तरंगों में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारी जीवनीशक्ति नष्ट होने लगती है ।*

*🔹प्रदक्षिणा ७, लाभ अनगिनत !🔹*

*🔹तीर्थों की अपनी महिमा है परंतु हयात ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुषों की महिमा तो निराली ही है । उनके लिए शास्त्र कहते हैं कि ‘वे तो चलते-फिरते तीर्थराज हैं, तीर्थ शिरोमणि हैं । ऐसे महापुरुष की यदि किसी वस्तु पर दृष्टि पड़ जाय, स्पर्श हो जाय अथवा वे उस पर संकल्प कर दें तो वह हमारे लिए ‘प्रसाद’ हो जाती है, प्रसन्नता, आनंद-उल्लास एवं शांति देनेवाली हो जाती है, साथ ही मनोकामनाएँ भी पूर्ण करती है ।*

*🔹इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है विश्वभर में स्थित संत श्री आशारामजी आश्रमों में ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष पूज्य बापूजी द्वारा शक्तिपात किये हुए वटवृक्ष या पीपल वृक्ष, जिन्हें ‘बड़ बादशाह’ अथवा ‘पीपल बादशाह’ के नाम से जाना जाता है । ये कलियुग के साक्षात् कल्पवृक्ष साबित हो रहे हैं । इनकी श्रद्धापूर्वक मात्र ७ प्रदक्षिणा करने से लाखों-लाखों लोगों ने अनगिनत लाभ उठाये हैं । कितनों के रोग मिट गये, कितनों के दुःख-संताप दूर हुए, कितनों की मनोकामनाएँ पूर्ण हुई हैं तथा कितनों की आध्यात्मिक उन्नति हुई है ।*

*🔹जब श्रद्धालु अपना दायाँ अंग आराध्य देव की ओर करके एवं मन-ही-मन प्रदक्षिणा की संख्या व संकल्प निश्चित करके प्रदक्षिणा करता है तो उसके शरीर, मन व बुद्धि पर इष्ट देवता की दिव्य तरंगों का विशेष प्रभाव पड़ता है । परिक्रमा के समय यदि मन से शुभ संकल्प व समर्पण भावना के साथ सर्वसिद्धि प्रदायक भगवन्नाम या गुरुमंत्र का जप सुमिरन होता है तो मन शुद्धि भी होती है और लौकिक शारीरिक, सांसारिक और भी लाभ होते हैं ।*