बीजापुर में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में 24 जवानों की शहादत ऑपरेशनल प्लानिंग की नाकामी की ओर इशारा कर रही है। 700 जवानों को घेरकर नक्सलियों ने 3 घंटे गोलियां चलाईं। 24 घंटे बाद जवानों के शव लेने के लिए रेस्क्यू टीम नहीं पहुंची। ये सब तब हुआ, जब 20 दिन पहले से ही इस इलाके में नक्सलियों की बड़ी तादाद में मौजूदगी की जानकारी मिल गई थी। जिस इलाके में मुठभेड़ हुई है, वह नक्सलियों की फर्स्ट बटालियन का कार्यक्षेत्र है। 20 दिन पहले UAV की तस्वीरों के जरिए पता चला था कि यहां बड़ी संख्या में नक्सली मौजूद हैं। ऑपरेशन में भी CRPF, STF, DRG, कोबरा और बस्तरिया जैसे हाइली ट्रेंड सुरक्षा बलों को शामिल किया गया। इसके बावजूद इस ऑपरेशन में सुरक्षा बलों से कहां चूक हुई, समझिए 5 पॉइंट्स में…
1. ऑपरेशनल प्लानिंग पर सवाल
केंद्र के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार व CRPF के पूर्व डीजीपी के. विजय कुमार के अलावा मौजूदा आईजी ऑपरेशंस पिछले 20 दिनों से जगदलपुर, रायपुर व बीजापुर के क्षेत्रों में खुद मौजूद थे। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में जवानों का शहीद होना पूरी ऑपरेशनल प्लानिंग पर सवाल खड़े कर रहा है। नक्सल ऑपरेशंस से जुड़े सूत्रों की माने तो इस तरह एक ही इलाके में तीन बड़े अधिकारियों की मौजूदगी नक्सलियों को भी अलर्ट कर देती है। उन्हें बड़े अधिकारियों के लगातार मूवमेंट की भनक लग जाती है, जिसके अनुसार वो अपनी प्लानिंग करते हैं। बीजापुर नक्सली हमले में भी यही हुआ।
2. वक्त के साथ रणनीति बदलनी चाहिए
छत्तीसगढ़ के गोरिल्ला वॉरफेयर इलाकों में सुरक्षाबल लंबे समय तक एक ही रणनीति के साथ सफलता हासिल नहीं कर सकते। यहां पर किसी एक रणनीति पर सालों साल चलते रहना जवानों के लिए घातक हो सकता है। बड़े अधिकारियों का काम यही होता है कि वो रणनीतिक बदलाव करके नक्सल मूवमेंट को कमजोर करें। ऊपर से बनी इन रणनीतियों पर ग्राउंड में मौजूद अधिकारी अपने इलाके की टोपोग्राफी और डिमांड के हिसाब से ऑपरेशन प्लान करते हैं, लेकिन अगर लंबे समय तक रणनीति में बदलाव न हो तो सुरक्षाबलों की मुश्किल और बढ़ती जाती है। ऐसे में नक्सलियों को अपने ऊपर होने वाले हमलों को गेज करना आसान हो जाता है और जवानों की जान जोखिम में पड़ जाती है।
3. हद से ज्यादा टेक्नोलॉजी पर निर्भरता
बीजापुर के इस नक्सली हमले से पहले अन आर्म्ड व्हिकल (UAV) या ड्रोन से मिली फोटो और वीडियो के आधार पर यहां ऑपरेशन प्लान किया गया, लेकिन नक्सल ऑपरेशन के सूत्र बताते हैं कि 100-200 नक्सलियों का मूवमेंट दिखना आम बात है। इसे आप किसी ऑपरेशन को प्लान करने का इंटेलिजेंस इनपुट नहीं मान सकते।
4. ह्यूमन इंटेलिजेंस की कमी
लोकल लेवल पर नक्सली गुटों के साथ शामिल लोग सुरक्षा बलों के लिए किसी भी हथियार से बड़ा सहारा होते हैं। इन्हीं से मिली जानकारी के आधार पर पिनपॉइंट ऑपरेशंस प्लान होते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से नक्सल ऑपरेशन में शामिल अधिकारी वाहवाही लूटने के लिए सरेंडर करवाने पर जोर देने लगे हैं। सरेंडर करने के बाद किसी नक्सली या मुखबिर से मिली जानकारी छह महीने से अधिक काम की नहीं होती। ऐसे में सुरक्षा बलों को अंदर से आने वाली सूचनाएं मिलना कम हो गई हैं।
5. अलग कमांड और ट्रेनिंग
पांच तरह की अलग-अलग फोर्सेज की ऐसे ऑपरेशन में मौजूदगी कमांड व कंट्रोल के लिए बड़ी चुनौती है। फायरिंग की सूरत में सभी अपने-अपने प्रशिक्षण व बनावट के हिसाब से कार्रवाई करते हैं। ऐसे में यूनिफॉर्मिटी नहीं रह पाती, लेकिन दूसरी ओर नक्सलियों की ट्रेनिंग और कमांड हमेशा एक ही रहता है। उनकी यूनिट कोई भी हो, लेकिन एक्शन के समय उनकी यूनिफॉर्मिटी कभी खराब नहीं होती।

