पिछले कई महीनों से टीवी शो ‘अनुपमा’ टीआरपी चार्ट में नंबर 1 की पोजीशन पर है। शो दर्शकों को काफी पसंद आ रहा है।

पिछले कई महीनों से टीवी शो ‘अनुपमा’ टीआरपी चार्ट में नंबर 1 की पोजीशन पर है। शो दर्शकों को काफी पसंद आ रहा है। इस शो को सालभर पहले लॉन्च करने की प्लानिंग थी, लेकिन लॉकडाउन के चलते लॉन्च डेट से एक दिन पहले निर्माता राजन शाही ने इसका प्रीमियर न करने का फैसला लिया। इसे लेकर 7 साल बाद टीवी पर कमबैक करने वाली रूपाली गांगुली नर्वस हो गई थीं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में रुपाली ने लॉकडाउन से जुड़े अनुभव शेयर किए। रूपाली ने जो बताया, पढ़िए उन्हीं की जुबानी

लॉकडाउन ने चीजों के मायने ही बदल दिए

हम सभी के लिए लॉकडाउन एक लर्निंग और अवेयरनेस प्रोसेस रहा है। कोरोना का तो डर था, लेकिन इसके साथ यह समझ आ गया कि हम यूनिवर्स में कितने छोटे हैं। हम इंसान भी किसी वायरस से कम नहीं हैं। एक छोटा सा वायरस आता है और लाखों लोगों की जान लेकर चला जाता है। बिना ये सोचे कि कौन अमीर है और कौन गरीब। इस वायरस ने कोई भेदभाव नहीं किया। पर्सनली, मेरी जिंदगी में यह लॉकडाउन बहुत बदलाव लाया है। चीजों के मायने ही बदल दिए हैं। फिर चाहे वह पिज्जा खाना का ही क्यों न हो। इस बात की समझ आ गई है कि जीने के लिए एक छत और सिंपल दाल, रोटी, चावल चाहिए। परिवार के प्यार के बिना हम कुछ नहीं। साथ ही हमें पर्यावरण का बहुत ख्याल रखना होगा।

शो के निर्माता पर मुझे बहुत भरोसा था

मेरा शो ‘अनुपमा’ लॉन्च के एक दिन पहले ही रोकदिया गया था। तब इस बात की नर्वसनेस जरूर थी कि क्या हम लौट पाएंगे या नहीं? जब लौटे तो शो का स्लॉट भी रात के 9 से 10 बजे का हो गया था। डर तो लगा था, लेकिन भगवान की कृपा से मैंने और हमारी टीम ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। मुझे पता था कि हमारा प्रोडक्ट बहुत अच्छा बना है। प्रीमियर होने से पहले 6 एपिसोड तैयार थे, मैंने वो एपिसोड देखे नहीं थे। लेकिन शूटिंग के दौरान काफी संतुष्ट थी। अपने आप पर कॉन्फिडेंस नहीं था, लेकिन शो के निर्माता (राजन शाही) पर मुझे बहुत भरोसा था।

नौकरों के घरवाले का भी ध्यान रखा

लॉकडाउन के दौरान मुझे और मेरे पति को अहसास हुआ कि हम सिर्फ अपने परिवार का नहीं, बल्कि और भी कई लोगों का ध्यान रख सकते हैं। एक तरफ जहां लोगों के घर में नौकर नहीं आ रहे थे तो वहीं मेरे साथ नौकरों के घर वाले भी रहते थे। मेरे ऑफिस में कई लोग रहते थे और हमने उनकी बेसिक जरूरत के सामान दाल, चावल, साबुन और कपड़े का इंतजाम किया।

हफ्ते के कुछ दिन फिल्मसिटी में गुजारती

हफ्ते के कुछ दिन मैं फिल्मसिटी में गुजारती थी। वहां के जितने भी कुत्ते और बंदर होते थे, उन्हें खाना देती थी। इसके लिए मुझे तकरीबन 7 से 8 घंटे लग जाते थे। हम सुबह-सुबह सुपर मार्केट की लाइन में खड़े होकर जानवरों के लिए खाना खरीदते थे। राशन की दूकान से से भी अनाज लाते थे। बंदरों के लिए गाड़ी भर के केला लाती थी। हम मेनका गांधी (एनीमल राइट एक्टिविस्ट) से स्पेशल परमिशन लेकर फिल्मसिटी आते थे। कुछ जानवर बीमार होते थे तो उन्हें उठाकर अस्पताल लेकर जाते थे। मेरे पति और बच्चों ने बहुत साथ दिया। दिन में आती थी और रात में घर लौटती थी। मेरे लिए लॉकडाउन से जुड़े सबसे यादगार पल यही हैं। सच कहूं तो अभी जितनी मेहनत कर रही हूं, उससे ज्यादा मेहनत लॉकडाउन में करती थी।

लॉकडाउन में हजामत करना सीख गई

लॉकडाउन में मैंने एक स्किल सीखा है और वो है हजामत करना। इस दौरान मैंने पति, बच्चे और भाई के हेयर कट किए थे। मैं अपने बाल भी काटती थी।