जिसने सूचना रोकी वहीं रखवाला बनने की तैयारी ,, “अशोक जुनेजा” मुख्य सूचना आयुक्त बनने के लिए लगा रहे जोर… 

छत्तीसगढ़ की नौकरशाही में एक बार फिर से हलचल मच गई है। पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) अशोक जुनेजा अब राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त (Chief Information Commissioner) बनने की दौड़ में शामिल हैं। लेकिन यह संभावित नियुक्ति सवालों के घेरे में है – न केवल जुनेजा के प्रशासनिक कार्यकाल को लेकर, बल्कि उनकी कार्यशैली, सेवा-वृद्धि में नियमों की अनदेखी और प्रभावशाली लॉबी के साथ रिश्तों को लेकर भी।

जब रबर स्टाम्प अफसर संवैधानिक संस्था की ओर बढ़े…

पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा का कार्यकाल कई विवादों और आलोचनाओं से भरा रहा। एक ओर जहां नशे के खिलाफ राज्य सरकार के सख्त आदेशों पर भी उन्होंने ढिलाई बरती, वहीं दूसरी ओर अपने कार्यकाल में कई बड़े घोटालों के समय वे चुप्पी साधे रहे। सूत्रों के अनुसार, डीजीपी कार्यालय फैसले लेने के बजाय “सिग्नेचर हाउस” बनकर रह गया था।

सेवा-वृद्धि में नियमों की अनदेखी

जुनेजा 30 जून 2023 को रिटायर हो चुके थे। लेकिन उन्हें पहले प्रभारी डीजीपी (2021) और फिर पूर्णकालिक डीजीपी (2022) बनाया गया। इतना ही नहीं, बार-बार उन्हें सेवा-वृद्धि दी गई – वो भी बिना गृह मंत्रालय की मंजूरी के। इस पर बीजेपी नेता नरेश चंद्र गुप्ता ने कहा, “यह सेवा-वृद्धि पूरी तरह से नियमविरुद्ध थी और इसकी शिकायत केंद्र सरकार और चुनाव आयोग तक की गई है।”

DGP थे या दफ्तरी बाबू?

सूत्रों की मानें तो जुनेजा के पास डीजीपी का ‘पद’ था, पर ‘पावर’ कुछ चुनिंदा अफसरों के पास थी। पोस्टिंग, तबादले और फैसले अक्सर “डाइनिंग टेबल” पर तय होते थे, और जुनेजा साहब बस ऑर्डर की तामील करते थे।

RTI जैसी संवेदनशील संस्था पर खतरा क्यों?

मुख्य सूचना आयुक्त का दायित्व है – सूचना के अधिकार की रक्षा करना, पारदर्शिता को बढ़ावा देना और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना। लेकिन जब एक अफसर जिसने अपने कार्यकाल में आंख-कान बंद रखे, आदेशों की केवल मुहर लगाई, और कभी स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया – उसे ही अगर यह जिम्मेदारी सौंप दी जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है।

संभावित खतरे:

1. संवैधानिक संस्थाओं में पक्षपात और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा।

2. RTI जैसी प्रणाली कमजोर होगी, पारदर्शिता में गिरावट आएगी।

3. अफसरशाही में जवाबदेही की बजाय ‘अनुमोदन संस्कृति’ को बढ़ावा मिलेगा।

क्या RTI को बनाया जाएगा ‘समाधि स्थल’?

राज्य में पहले ही प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर आमजन की नाराजगी है। ऐसे में अगर सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति योग्यता की बजाय नज़दीकी के आधार पर की गई, तो यह न केवल संविधान, बल्कि जनता के अधिकारों के साथ विश्वासघात होगा।

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