काशी विश्वनाथ मंदिर के 10 रोचक तथ्य: 750 साल पुरानी सप्तऋषि आरती

काशी विश्वनाथ मंदिर के 10 रोचक तथ्य: 750 साल पुरानी सप्तऋषि आरती

वाराणसी की पहचान सिर्फ गंगा के घाटों और प्राचीन गलियों से नहीं है, बल्कि यहां विराजमान बाबा विश्वनाथ की वजह से भी काशी का धार्मिक महत्व दुनिया भर में है। मान्यता है कि काशी भगवान शिव की प्रिय नगरी है और यहां के कण-कण में शिव का वास है। यही वजह है कि हर साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है काशी विश्वनाथ

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा नदी के किनारे स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे विश्वेश्वर नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ ‘ब्रह्मांड के स्वामी’ से जोड़ा जाता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के काशी आने के बाद बाबा विश्वनाथ ने इसी नगरी को अपना निवास बनाया। मान्यता है कि भगवान शिव यहां विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।

1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया मंदिर का निर्माण

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास बेहद पुराना माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में काशी और भगवान विश्वनाथ का उल्लेख मिलता है। वर्तमान मंदिर के निर्माण का श्रेय वर्ष 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर को दिया जाता है।इसके बाद कई राजाओं और श्रद्धालुओं ने मंदिर के विकास में योगदान दिया। पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर के लिए सोना दान किया था। वहीं ग्वालियर की महारानी बैजाबाई के योगदान का भी उल्लेख मिलता है।काशी विश्वनाथ के दर्शन करने वाले प्रमुख संतों और धार्मिक व्यक्तित्वों में आदि गुरु शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस और गोस्वामी तुलसीदास जैसे नाम भी लिए जाते हैं।

मंदिर पर कई बार हुए हमले

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भी जुड़ा रहा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार अलग-अलग कालखंडों में मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया और बाद में इसका पुनर्निर्माण भी हुआ।मंदिर के इतिहास में मध्यकालीन आक्रमणों का भी उल्लेख मिलता है। बाद के समय में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्तमान मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

काशी से जुड़े हैं कई धार्मिक विश्वास

काशी को लेकर कई प्राचीन धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि भगवान शिव की यह नगरी उनके त्रिशूल पर स्थित है। काशी को मोक्षदायिनी भी कहा जाता है और धार्मिक विश्वास है कि यहां मृत्यु होने पर व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।एक अन्य मान्यता के अनुसार काशी में भगवान विष्णु के अश्रुओं से बिंदु सरोवर का निर्माण हुआ था।इसके अलावा बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन की भी धार्मिक परंपरा मानी जाती है। काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है।

2021 में बदली काशी विश्वनाथ धाम की तस्वीर

काशी विश्वनाथ धाम का आधुनिक स्वरूप विकसित होने के बाद मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं में काफी विस्तार हुआ। वर्ष 2021 में काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का लोकार्पण किया गया, जिसके बाद मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र का व्यापक कायाकल्प हुआ।कॉरिडोर के जरिए मंदिर को गंगा घाटों से जोड़ा गया। श्रद्धालुओं के लिए आवागमन, दर्शन और अन्य सुविधाओं को बेहतर बनाया गया।

गर्भगृह में सोने की परत भी है खास

काशी विश्वनाथ मंदिर की भव्यता में सोने की परत भी विशेष आकर्षण का हिस्सा है। मंदिर के गर्भगृह की दीवारों पर सोने की परत चढ़ाई गई है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसके लिए करीब 37 किलोग्राम सोने का इस्तेमाल किया गया है।मंदिर का यह स्वर्णिम स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

750 साल से चली आ रही सप्तऋषि आरती की परंपरा

काशी विश्वनाथ मंदिर की पूजा परंपराओं में सप्तऋषि आरती को बेहद विशेष माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह आरती सात अलग-अलग ऋषियों के प्रतीक सात ब्राह्मणों द्वारा की जाती है।मान्यता है कि काशी विश्वनाथ मंदिर में सप्तऋषि आरती की परंपरा 750 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही है। इसके अलावा मंदिर में मंगला आरती, भोग आरती, श्रृंगार आरती और शयन आरती जैसी प्रमुख आरतियां भी होती हैं।

सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़

काशी विश्वनाथ मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन के महीने में यहां भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती है। महाशिवरात्रि और नाग पंचमी जैसे अवसरों पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए वाराणसी पहुंचते हैं।गंगा घाटों की आरती और काशी विश्वनाथ धाम के दर्शन धार्मिक यात्रा का प्रमुख आकर्षण माने जाते हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर कैसे पहुंचें

काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचने के लिए पहले वाराणसी पहुंचना होता है। वाराणसी देश के प्रमुख शहरों से रेल, सड़क और हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है।वाराणसी रेलवे स्टेशन से मंदिर तक पहुंचने के लिए ऑटो, कैब और अन्य स्थानीय परिवहन साधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा प्रमुख विकल्प है।काशी की प्राचीन परंपराएं, गंगा घाट, बाबा विश्वनाथ का धाम और यहां से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इस शहर को भारत के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में शामिल करती हैं।

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