नई दिल्ली।जंतर-मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन अनशन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर दिल्ली हाईकोर्ट बुधवार को सुनवाई करेगा। याचिका में 18 जुलाई को हुए पुलिस ऑपरेशन की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने के साथ-साथ भविष्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तावित है।
वकील ने दायर की जनहित याचिका
यह जनहित याचिका दिल्ली के अधिवक्ता शकील अब्बास ने एडवोकेट शकील शेख एंड एसोसिएट्स के माध्यम से दायर की है। याचिका में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त, नई दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त, संसद मार्ग थाना प्रभारी, दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक को प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b), 19(1)(c) और अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
28 जून से शुरू हुआ था अनिश्चितकालीन अनशन
याचिका के अनुसार, सोनम वांगचुक, छात्रों और अन्य नागरिकों ने 28 जून 2026 से जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में सुधार और कथित परीक्षा पेपर लीक के विरोध में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। दावा किया गया है कि 17 जुलाई तक पूरा आंदोलन शांतिपूर्ण और अहिंसक रहा तथा किसी प्रकार की हिंसा की घटना सामने नहीं आई।
18 जुलाई की कार्रवाई पर उठे सवाल
याचिका में आरोप लगाया गया है कि 18 जुलाई, अनशन के 21वें दिन, पुलिस बल प्रदर्शन स्थल पर पहुंचा। प्रशासन की ओर से कहा गया कि सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें इलाज के लिए सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया।
हालांकि याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसी दौरान पुलिस ने प्रदर्शन स्थल खाली कराया, कई प्रदर्शनकारियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध हटाया या हिरासत में लिया तथा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आवश्यकता से अधिक बल का प्रयोग किया। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों को आगे आंदोलन जारी रखने से रोका गया और उन्हें परेशान किया गया।
संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
याचिका में कहा गया है कि यह मामला केवल किसी एक व्यक्ति या आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार से जुड़ा हुआ है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि पुलिस की कथित कार्रवाई से लोकतांत्रिक असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसी कारण अदालत से संस्थागत और भविष्य के लिए प्रभावी सुरक्षा उपाय तय करने का अनुरोध किया गया है।
स्वतंत्र जांच और सबूत सुरक्षित रखने की मांग
जनहित याचिका में अदालत से मांग की गई है कि दिल्ली पुलिस आयुक्त अथवा किसी स्वतंत्र सक्षम एजेंसी के माध्यम से 18 जुलाई की पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराई जाए।
प्रदर्शन स्थल के CCTV फुटेजवाई से जुड़े सभी रिकॉर्ड अदालत में पेश करने की मांग
याचिका में अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि 18 जुलाई को चलाए गए पूरे पुलिस अभियान से संबंधित दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं। इनमें पुलिस बल की तैनाती के आदेश, कार्रवाई की स्वीकृति, मेडिकल संचार रिकॉर्ड और अन्य प्रशासनिक दस्तावेज शामिल हैं।
यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने की भी मांग की गई है।
भविष्य के लिए दिशा-निर्देश बनाने की अपील
याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं, ताकि भविष्य में किसी भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को मनमाने तरीके से बाधित न किया जा सके।
याचिका में कहा गया है कि ऐसे दिशा-निर्देश नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
आज की सुनवाई पर सबकी नजर
इस मामले की सुनवाई ऐसे समय हो रही है जब शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और विरोध प्रदर्शनों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज है। हाईकोर्ट की कार्यवाही से यह स्पष्ट हो सकेगा कि अदालत पुलिस कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा, स्वतंत्र जांच और भविष्य के लिए संस्थागत सुरक्षा उपायों की मांग पर क्या रुख अपनाती है।
