छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सामने आए ₹17 करोड़ के फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले में कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है। मामले में तहसील कार्यालय के तीन राजस्व लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। वहीं पुलिस अब आठ अन्य कर्मचारियों के बयान दर्ज करने की तैयारी में है। इस बीच कर्मचारियों की गिरफ्तारी के विरोध में छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ और छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने मोर्चा खोल दिया है। दोनों संगठनों ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है और कार्रवाई नहीं रुकने पर सामूहिक अवकाश पर जाने की चेतावनी दी है।
तीन क्लर्क गिरफ्तार, निलंबन की कार्रवाई
पुलिस ने तहसील कार्यालय के कर्मचारी गरीब बिंझवार, नरेंद्र कौशिक और हरिराम राठौर को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। गिरफ्तारी के बाद तीनों को निलंबित भी कर दिया गया। इससे पहले गोविंद विश्वकर्मा, वकील खांडेकर और डॉक्टर प्रियंका सोनी सहित कई अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस के अनुसार मामले में आठ अन्य कर्मचारियों के बयान दर्ज किए जाने बाकी हैं और जांच लगातार जारी है।
लिपिक संघ ने गिरफ्तारी पर जताई आपत्ति
राजस्व लिपिक संघ का आरोप है कि कर्मचारियों को पहले केवल बयान दर्ज कराने के लिए सरकंडा थाने बुलाया गया था, लेकिन बाद में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। संघ का कहना है कि आठ अन्य कर्मचारियों को भी नोटिस जारी किया गया था और सभी ने 23 जुलाई को पुलिस जांच में पूरा सहयोग किया, फिर भी उनके खिलाफ कार्रवाई की आशंका बनी हुई है।
“रीडर केवल दस्तावेज प्रस्तुत करता है”
संघ ने अपने ज्ञापन में कहा है कि प्राकृतिक आपदा से मौत होने पर शासन के नियमों के तहत ₹4 लाख की आर्थिक सहायता दी जाती है। आवेदन मिलने के बाद संबंधित दस्तावेज न्यायालय में प्रस्तुत किए जाते हैं। रीडर और वाचक की भूमिका केवल रिकॉर्ड और दस्तावेज पेश करने तक सीमित होती है, जबकि मुआवजा स्वीकृत करने का अंतिम अधिकार संबंधित पीठासीन अधिकारी के पास होता है। इसलिए केवल दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले कर्मचारियों को आरोपी बनाना उचित नहीं है।
निष्पक्ष जांच की मांग
संघ का कहना है कि जांच में फर्जी हस्ताक्षर, नकली सील और झूठे शपथ पत्रों के इस्तेमाल की बात सामने आई है। यदि ऐसा हुआ है तो पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक दोषियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए। संगठन का आरोप है कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।
सामूहिक अवकाश की चेतावनी
राजस्व लिपिक संघ ने स्पष्ट किया है कि यदि कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं रोकी गई और उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं दी गई तो जिले के सभी राजस्व लिपिक सामूहिक अवकाश पर चले जाएंगे। ऐसा होने की स्थिति में तहसील कार्यालयों में नामांतरण, सीमांकन, आय-जाति-निवास प्रमाण पत्र समेत कई राजस्व संबंधी कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
क्या है ₹17 करोड़ का फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाला?
मामले की जांच में सामने आया कि जशपुर जिले में पिछले तीन वर्षों के दौरान सर्पदंश से 96 मौतें दर्ज हुईं, जबकि अकेले बिलासपुर जिले में 431 लोगों की सर्पदंश से मौत दिखाकर करीब ₹17.24 करोड़ का मुआवजा जारी कर दिया गया। यह मामला विधानसभा में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला द्वारा उठाए जाने के बाद चर्चा में आया, जिसके बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए।
सरकारी नियमों के अनुसार सर्पदंश से मौत होने पर मृतक के परिजनों को ₹4 लाख की आर्थिक सहायता दी जाती है। जांच में आरोप है कि इसी योजना का दुरुपयोग करते हुए फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए और सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मौत बताकर मुआवजा स्वीकृत कराया गया। कई मामलों में मृतकों के परिजनों की जानकारी या सहमति के बिना ही राशि निकाल ली गई और उसे आरोपियों के बीच बांट दिया गया।
अब तक 17 गिरफ्तार, ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ की जांच जारी
पुलिस जांच में अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी और तहसील कर्मचारियों सहित 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। जांच एजेंसियों का दावा है कि इस पूरे नेटवर्क में पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और राजस्व विभाग के कुछ अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे। आरोप है कि अस्पताल में किसी भी संदिग्ध मौत की सूचना मिलते ही यह गिरोह सक्रिय हो जाता था और फर्जी सर्पदंश का मामला तैयार कर लगभग ₹1.5 लाख में पूरी सेटिंग की जाती थी। फिलहाल पुलिस पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है और आने वाले दिनों में इस मामले में और भी गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।
