अंतरिक्ष में तंबाकू के पौधे से बनेंगी दवाइयां, मंगल मिशन के लिए तैयार हुई अनोखी तकनीक

अंतरिक्ष में तंबाकू के पौधे से बनेंगी दवाइयां, मंगल मिशन के लिए तैयार हुई अनोखी तकनीक

भविष्य में मंगल ग्रह जैसे लंबे अंतरिक्ष मिशनों पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को दवाइयों की कमी का सामना नहीं करना पड़ सकता। NASA समर्थित वैज्ञानिकों ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए अंतरिक्ष में ही जरूरत के अनुसार औषधीय प्रोटीन और दवाइयां तैयार की जा सकेंगी। यह शोध कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय सैन डिएगो (UC San Diego) के इंजीनियरों ने किया है, जिसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल  Science of Plants में प्रकाशित किया गया है।

यह तकनीक तंबाकू परिवार के एक विशेष पौधे और एक हानिरहित वायरस की मदद से विकसित की गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह भविष्य के मंगल मिशनों के साथ-साथ पृथ्वी पर भी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा बदलाव ला सकती है।

अंतरिक्ष में दवाइयां क्यों हो जाती हैं बेअसर?

NASA के अनुसार पृथ्वी से मंगल ग्रह तक पहुंचने में लगभग 200 से 400 दिन का समय लग सकता है, जबकि पूरा मिशन 400 से 900 दिनों तक चल सकता है। इतनी लंबी यात्रा के दौरान अंतरिक्ष का उच्च रेडिएशन और माइक्रोग्रैविटी कई दवाइयों की प्रभावशीलता कम कर देते हैं।

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर किए गए अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने पर कई दवाइयां समय से पहले खराब या कम असरदार हो सकती हैं। ऐसे में पृथ्वी से पर्याप्त मात्रा में दवाइयां ले जाना हमेशा व्यावहारिक विकल्प नहीं माना जाता।

तंबाकू का पौधा कैसे बनाएगा दवाइयां?

शोधकर्ताओं ने Nicotiana benthamiana नामक तंबाकू परिवार के पौधे को एक जैविक फैक्ट्री (Biofactory) के रूप में इस्तेमाल किया है। यह पौधा तेजी से बढ़ता है और वैज्ञानिक अनुसंधान में पहले से उपयोग किया जाता रहा है।

इसके साथ Cowpea Mosaic Virus (CPMV) नामक एक हानिरहित वायरस का इस्तेमाल किया गया है। यह वायरस इंसानों के लिए सुरक्षित माना जाता है और पौधे की कोशिकाओं तक आनुवंशिक निर्देश पहुंचाकर विशेष औषधीय प्रोटीन तैयार करवाता है। भविष्य में इन्हीं प्रोटीनों का उपयोग वैक्सीन, कैंसर इम्यूनोथेरेपी और अन्य दवाइयों के निर्माण में किया जा सकता है।

अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियों में हुआ सफल परीक्षण

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर विशेष उपकरणों की मदद से माइक्रोग्रैविटी और अंतरिक्ष जैसे रेडिएशन वाला वातावरण तैयार किया। इन परिस्थितियों में पौधों ने पहले की तुलना में अधिक मात्रा में औषधीय प्रोटीन तैयार किए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह परिणाम दर्शाते हैं कि अंतरिक्ष जैसी कठिन परिस्थितियों में भी पौधों के माध्यम से आवश्यक दवाइयों का उत्पादन संभव हो सकता है।

बिना पौधे को नुकसान पहुंचाए निकाली जाएगी दवा

इस शोध की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में नई Vacuum-Assisted Infiltration और Centrifugation तकनीक शामिल है।

पहले पौधों से औषधीय प्रोटीन निकालने के लिए उनकी पत्तियों को तोड़कर नष्ट करना पड़ता था। नई तकनीक में पत्तियों के भीतर मौजूद औषधीय तरल को बिना पौधे को नुकसान पहुंचाए निकाला जा सकता है।

इससे एक ही पौधे से कई बार दवा तैयार की जा सकेगी और अंतरिक्ष मिशनों के दौरान जैविक कचरा भी कम होगा।

कैंसर और वैक्सीन विकसित करने में मिलेगी मदद

शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक भविष्य में कैंसर इम्यूनोथेरेपी, प्रोटीन आधारित दवाइयों और विभिन्न प्रकार की वैक्सीन विकसित करने में उपयोगी साबित हो सकती है। आवश्यकता पड़ने पर अंतरिक्ष यात्री मिशन के दौरान ही नई दवाइयां तैयार कर सकेंगे।

पृथ्वी पर भी मिलेगा बड़ा फायदा

यह तकनीक केवल अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं रहेगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि बिजली और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं से दूर ग्रामीण एवं दूरदराज क्षेत्रों में भी कम लागत पर ताजा दवाइयां तैयार करने में इसका उपयोग किया जा सकता है।

इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित इलाकों और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं वाले क्षेत्रों में भी यह तकनीक भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

मंगल मिशन के लिए साबित हो सकती है गेम चेंजर

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के अंतरिक्ष यानों में छोटे-छोटे बायोफैक्ट्री ग्रीनहाउस बनाए जा सकते हैं, जहां अंतरिक्ष यात्री आवश्यकता के अनुसार दवाइयां तैयार करेंगे। इससे पृथ्वी से भारी मात्रा में दवाइयां ले जाने की जरूरत कम होगी और लंबे अंतरिक्ष अभियानों को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकेगा। यह शोध अंतरिक्ष चिकित्सा (Space Medicine) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है और भविष्य के मानव अंतरिक्ष मिशनों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *