Goa SIR Voter List: गोवा में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान 97 ऐसे मतदाताओं के नाम फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सके, जिन्हें स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों और आपत्तियों की जांच के बाद योग्य माना था। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इन मतदाताओं के नाम पहले ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर हटाए जाने की प्रक्रिया में थे। बाद में ERO और AERO ने मामलों की सुनवाई कर पुराने फैसले को बदलने की जरूरत मानी, लेकिन ECINet में ऐसा करने के लिए जरूरी ‘रोलबैक’ सुविधा उपलब्ध नहीं थी।
ERO-AERO ने फैसला बदला, लेकिन सिस्टम में नहीं हो सका बदलाव
रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर चिन्हित मतदाताओं को दस्तावेज और आपत्तियां दाखिल करने का अवसर दिया गया था। गोवा में 649 मतदाताओं ने दस्तावेज या आपत्तियां पेश कीं। इनमें से 97 मामलों में ERO और AERO ने जांच के बाद माना कि संबंधित मतदाता फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने के योग्य हैं।
समस्या यह थी कि पुराने फैसले ECINet में पहले ही दर्ज हो चुके थे। स्थानीय अधिकारियों के पास उन्हें वापस लेने या नया निर्णय दर्ज करने के लिए जरूरी रोलबैक/रिवर्ट विकल्प उपलब्ध नहीं था।
गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने इस सुविधा के लिए चुनाव आयोग को कई बार पत्र और ईमेल भेजे।
7 दिन में 8 ईमेल, फिर भी नहीं मिला समाधान
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 13 से 17 फरवरी के बीच गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने लगातार कई बार चुनाव आयोग से संपर्क किया। रिपोर्ट में बताया गया है कि सात दिनों में 8 ईमेल/पत्र भेजकर 97 मतदाताओं के मामलों में रोलबैक सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की गई।
गोवा इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने भी चुनाव अधिकारियों और संबंधित तकनीकी पक्ष को बताया था कि सिस्टम में रोलबैक और दस्तावेज दोबारा अपलोड करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
18 फरवरी को डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संजय कुमार ने चुनाव आयोग की आईटी प्रमुख को लिखा कि ERO और AERO को सुधारात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है और आईटी सिस्टम को जरूरी कार्रवाई में बाधा नहीं बनना चाहिए।
इसके बावजूद 21 फरवरी को फाइनल SIR वोटर लिस्ट जारी हुई और रिपोर्ट के मुताबिक ये 97 नाम उसमें शामिल नहीं थे। द इंडियन एक्सप्रेस ने 20 सितंबर तक इन सभी 97 नामों की जांच की और बताया कि वे फाइनल लिस्ट में वापस नहीं आए थे।
97 में 65 मतदाता तालेगांव से
रिपोर्ट के अनुसार, इन 97 मतदाताओं में 65 तालेगांव विधानसभा क्षेत्र से थे। बाकी मामले सेंट क्रूज, कुम्बारजुआ, प्रियोल, मडगांव, बेनाउलिम और वेलिम विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े थे।
यह मामला चुनावी रिकॉर्ड तैयार करने में स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के फैसले और केंद्रीकृत डिजिटल सिस्टम के बीच समन्वय को लेकर सवाल खड़ा करता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने इसे ECINet के केंद्रीकरण से जुड़े व्यापक सवालों के संदर्भ में रखा है।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का क्या मतलब है?
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का मतलब अपने आप में यह नहीं है कि कोई व्यक्ति मतदाता नहीं है। यह ऐसा डेटा mismatch है, जिसे चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर पुराने SIR रिकॉर्ड से मौजूदा मतदाता की जानकारी मिलाने के दौरान चिन्हित करता है। इसमें नाम का मेल न होना, उम्र से जुड़े अंतर या पुराने रिकॉर्ड से लिंक नहीं होना जैसी स्थितियां शामिल हो सकती हैं।
वोटर लिस्ट से नाम बाहर रहने का असर
द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया है कि गोवा में वोटर लिस्ट में नाम होने का संबंध कुछ राज्य योजनाओं की पात्रता से भी हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की मेडिक्लेम योजना में डायलिसिस, एंजियोप्लास्टी, ट्रांसप्लांट और कीमोथेरेपी जैसे उपचार शामिल हैं और पात्रता से जुड़े नियमों में राज्य का मतदाता होना एक शर्त बताई गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, फाइनल सूची में नाम नहीं आने के बाद कुछ प्रभावित लोगों को Form 6 के जरिए दोबारा मतदाता के रूप में आवेदन करने को कहा गया।
चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था पर बहस
गोवा का यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया और ECINet के इस्तेमाल को लेकर व्यापक बहस चल रही है। इंडियन एक्सप्रेस की एक अन्य जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनावी प्रक्रिया और डिजिटल सिस्टम से जुड़े मुद्दों पर कई आपत्तियां दर्ज की थीं। हालांकि, इन रिपोर्टों में लगाए गए आरोपों और चुनाव आयोग की आधिकारिक स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है।
