करवा चौथ पर जानें कार्तिक मास में दीपदान का महत्व, पूजा विधि और धार्मिक मान्यताएं

29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को करवा चौथ, करक चतुर्थी और संकष्ट चतुर्थी का पर्व मनाया जाएगा। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। सनातन पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि रात 10:09 बजे तक रहेगी और चंद्रोदय रात 8:33 बजे बताया गया है। कार्तिक मास में पूजा-पाठ के साथ दीपदान का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। लिंग पुराण, अग्नि पुराण और पद्म पुराण में दीपदान से जुड़ी विभिन्न मान्यताओं का उल्लेख मिलता है।

29 अक्टूबर 2026 का पंचांग

गुरुवार को विक्रम संवत 2083 और शक संवत 1948 रहेगा। इस दिन कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष और हेमंत ऋतु का उल्लेख पंचांग में किया गया है।

  • दिन: गुरुवार
  • तिथि: चतुर्थी रात 10:09 बजे तक, इसके बाद पंचमी
  • नक्षत्र: रोहिणी सुबह 11:11 बजे तक, इसके बाद मृगशिरा
  • योग: परिघ रात 12:06 बजे तक, इसके बाद शिव
  • राहुकाल: दोपहर 1:48 बजे से शाम 3:13 बजे तक
  • सूर्योदय: सुबह 6:41 बजे
  • सूर्यास्त: शाम 6:03 बजे
  • चंद्रोदय: रात 8:33 बजे
  • दिशाशूल: दक्षिण दिशा

कार्तिक मास में दीपदान का क्या है महत्व

हिंदू धार्मिक परंपरा में कार्तिक मास को पूजा, स्नान और दीपदान के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने में मंदिरों, घरों और पूजा स्थलों पर दीपक जलाने की परंपरा है।

लिंग पुराण में भगवान शिव के समक्ष घी का दीपक अर्पित करने और श्रद्धापूर्वक पूजा करने का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिवजी के सामने दीपदान करना पुण्यकारी माना गया है।

इसी तरह अग्नि पुराण में भी दीपदान की महिमा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं में दीपदान को सौभाग्य, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण की कामना से जोड़ा जाता है। इन धार्मिक फलों को आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।

कार्तिक मास में कैसे करें दीपदान

कार्तिक मास में दीपदान करते समय श्रद्धालु अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार मिट्टी, तांबे, पीतल, चांदी या अन्य उपयुक्त सामग्री के दीपक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

दीपदान की सामान्य विधि इस प्रकार है:

  1. दीपक को अच्छी तरह साफ कर लें। मिट्टी का नया दीपक इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उसे कुछ समय पानी में भिगोकर सुखाया जा सकता है।
  2. सूर्यास्त के बाद पूजा स्थल या मंदिर में दीपदान की तैयारी करें।
  3. दीपक में घी या तेल और उपयुक्त बाती रखें।
  4. धार्मिक परंपरा के अनुसार दीपक को चावल, गेहूं या किसी अन्य उपयुक्त आधार पर रखा जा सकता है।
  5. भगवान शिव या भगवान विष्णु के समक्ष दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें।
  6. अपनी श्रद्धा के अनुसार शिव मंत्र, दारिद्र्यदहन शिव स्तोत्र या गजेंद्र मोक्ष का पाठ कर सकते हैं।

दीपक जलाते समय आग से सुरक्षा का ध्यान रखें। उसे स्थिर, सुरक्षित और ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रखें।

कार्तिक मास में किन पांच दिनों में दीपदान का विशेष महत्व है

धार्मिक परंपरा में कार्तिक कृष्ण पक्ष के पांच दिनों में दीपदान को विशेष महत्व दिया गया है। पद्म पुराण के उत्तरखंड में कार्तिक मास के इन दिनों में दीपदान की महिमा का वर्णन मिलता है।

परंपरा के अनुसार, इन दिनों घर, मंदिर और अन्य उपयुक्त पूजा स्थलों पर सूर्यास्त के बाद दीपक जलाए जाते हैं। श्रद्धालु अपनी आस्था और सुविधा के अनुसार दीपदान कर सकते हैं।

कार्तिक मास में दीप जलाने का उद्देश्य धार्मिक आस्था के साथ प्रकाश, शुभता और सकारात्मकता का प्रतीकात्मक संदेश भी है।

करवा चौथ पर पूजा और चंद्रोदय का महत्व

करवा चौथ पर विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक सुख की कामना से व्रत रखती हैं। कई परंपराओं में महिलाएं चंद्रमा के दर्शन और पूजा के बाद व्रत खोलती हैं।

दिए गए पंचांग के अनुसार, 29 अक्टूबर को चंद्रोदय रात 8:33 बजे बताया गया है। हालांकि, वास्तविक चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय समय-सारणी से इसकी पुष्टि करना उचित है।

कार्तिक मास में शालिग्राम शिला के दान की मान्यता

कार्तिक मास से जुड़ी धार्मिक सामग्री में शालिग्राम शिला के दान का भी उल्लेख मिलता है। स्कंद पुराण के संदर्भ में शालिग्राम शिला के दान को विशेष पुण्यकारी बताया गया है।

वैष्णव परंपरा में शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु इसकी पूजा करते हैं और धार्मिक अवसरों पर दान-पुण्य करते हैं। ऐसी परंपराओं का पालन अपनी आस्था, पारिवारिक रीति और धार्मिक मार्गदर्शन के अनुसार किया जा सकता है।

करवा चौथ और कार्तिक मास में रखें इन बातों का ध्यान

पंचांग में चतुर्थी तिथि पर मूली का सेवन करने से बचने की एक धार्मिक मान्यता का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण के संदर्भ में किया गया है। इसी प्रकार चतुर्मास में पात्रों के इस्तेमाल और पलाश के पत्तों की पत्तल पर भोजन करने से जुड़ी परंपराएं भी बताई गई हैं।

इन बातों को धार्मिक मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए। व्रत रखने वाले लोग अपनी सेहत, जरूरतों और पारिवारिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए पूजा-पाठ करें।

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