जब जंगल में पसंदीदा फल कम हो जाते हैं, तो दाढ़ी वाले कैपुचिन बंदर अपने भोजन की तलाश का तरीका बदल देते हैं। ब्राजील में हुई 45 महीने की लंबी फील्ड स्टडी में पाया गया कि फल की उपलब्धता घटने पर ये बंदर छोटे कशेरुकी जीवों का शिकार ज्यादा करने लगते हैं। इनके शिकार में छिपकली, चूहे, सांप, इगुआना, चमगादड़ और पक्षियों के बच्चे जैसे जीव शामिल रहे। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह व्यवहार प्राइमेट्स में भोजन की कमी के दौरान ऊर्जा हासिल करने की रणनीति को समझने में मदद कर सकता है।
45 महीने तक किया गया बंदरों का अध्ययन
शोधकर्ताओं ने ब्राजील के उत्तर-पूर्वी इलाके स्थित Fazenda Boa Vista में जंगली दाढ़ी वाले कैपुचिन बंदरों के दो समूहों का अध्ययन किया। वर्ष 2006 से 2010 के बीच करीब 5,000 घंटे से ज्यादा समय तक इन बंदरों का निरीक्षण किया गया। इस दौरान शोधकर्ताओं ने कशेरुकी जीवों को खाते हुए बंदरों के 446 मामले दर्ज किए। इनमें छिपकलियां करीब 43 फीसदी और कृंतक यानी चूहे जैसे जीव लगभग 28 फीसदी थे। स्टडी में पहली बार इन बंदरों के इगुआना, ओपॉसम और पक्षियों के बच्चों को खाने के मामले भी दर्ज किए गए।
फल कम हुए तो बढ़ गया शिकार
अध्ययन में फल की उपलब्धता और शिकार के बीच स्पष्ट संबंध देखने को मिला। जिस समूह को सूखे मौसम में अतिरिक्त मेवे, मक्का और पानी दिया गया था, उसने दूसरे समूह की तुलना में कम शिकार किया। जिस समूह को अतिरिक्त भोजन नहीं मिला, उसके सदस्यों ने लगभग दोगुनी दर से शिकार किया। इससे संकेत मिलता है कि पसंदीदा भोजन की कमी होने पर छोटे जानवर इन बंदरों के लिए महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत बन जाते हैं।
नर बंदर ज्यादा करते हैं शिकार
स्टडी में नर और मादा बंदरों के व्यवहार में भी अंतर देखने को मिला। नर बंदरों ने मादाओं की तुलना में करीब 1.4 गुना ज्यादा कशेरुकी जीवों का सेवन किया। खास बात यह रही कि सांप खाने के मामले केवल नर बंदरों में देखे गए। शोधकर्ताओं का मानना है कि नर बंदरों के बड़े शरीर के कारण उनकी ऊर्जा जरूरत ज्यादा हो सकती है। साथ ही खतरनाक और तेजी से भागने वाले शिकार को पकड़ने के लिए अनुभव और शारीरिक क्षमता भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

छोटे बंदरों में अनुभव की भूमिका
अध्ययन में उम्र के साथ शिकार की क्षमता बढ़ने के संकेत भी मिले। शिशु बंदरों द्वारा कशेरुकी जीवों के सेवन की दर वयस्कों की तुलना में करीब पांच गुना कम थी। वहीं किशोर बंदरों और वयस्कों के बीच इस मामले में बड़ा अंतर नहीं पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि ताकत, तालमेल और शिकार को पकड़ने का अनुभव विकसित होने के साथ बंदर प्रभावी शिकारी बन सकते हैं।
दिमाग और अंदरूनी अंगों को प्राथमिकता
शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि बंदर कई बार शिकार के सामान्य मांस के बजाय पहले दिमाग और अंदरूनी अंगों को खाते थे। इन हिस्सों में वसा और दूसरे पोषक तत्व अधिक मात्रा में हो सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, भोजन की कमी के दौरान ऐसे ऊर्जा-समृद्ध हिस्से बंदरों के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकते हैं।
मानव विकास को समझने में मिल सकती है मदद
इस अध्ययन का संबंध मानव विकास को समझने से भी जोड़ा गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि शुरुआती मानव पूर्वजों ने बड़े जानवरों का नियमित शिकार शुरू करने से पहले छोटे जीवों से पोषण हासिल किया हो सकता है।
छोटे कशेरुकी जीवों को बड़े शिकार की तुलना में पकड़ना आसान था और इसके लिए जटिल हथियार या बड़े समूह की जरूरत भी कम हो सकती थी। हालांकि कैपुचिन बंदरों को मानव पूर्वजों का सीधा मॉडल नहीं माना जा सकता, लेकिन उनका व्यवहार यह समझने में मदद कर सकता है कि भोजन की कमी, शारीरिक क्षमता, अनुभव और अवसर किस तरह प्राइमेट्स में शिकार की प्रवृत्ति को प्रभावित करते हैं।
शोधकर्ताओं ने जीवाश्म रिकॉर्ड पर नए सिरे से ध्यान देने की बात कही
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि शुरुआती मानव स्थलों से मिले छोटे जानवरों के अवशेषों की भी नए नजरिए से जांच की जानी चाहिए। हड्डियों पर काटने के निशान, टूटी खोपड़ी या दिमाग और अंदरूनी अंगों तक पहुंच के संकेत इस बात की जानकारी दे सकते हैं कि शुरुआती मानव पूर्वज छोटे जीवों का शिकार किस तरह करते थे।
