नेपाल और तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर ग्लेशियरों के पिघलने और जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इस प्राकृतिक आपदा के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि अगर भविष्य में धरती की ध्रुवीय और पर्वतीय बर्फ का बड़ा हिस्सा पिघल गया, तो दुनिया का नक्शा किस तरह बदल सकता है? विशेषज्ञों के मुताबिक निकट भविष्य में धरती की पूरी बर्फ के पिघलने की संभावना नहीं है। लेकिन लगातार जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के चलते हजारों वर्षों में बेहद गर्म परिस्थितियां बनने पर बर्फ का विशाल भंडार तेजी से कम हो सकता है।
पूरी बर्फ पिघली तो समुद्र 216 फीट ऊपर
धरती पर 50 लाख क्यूबिक मील से अधिक बर्फ मौजूद होने का अनुमान है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसे पूरी तरह पिघलने में 5,000 साल से भी ज्यादा समय लग सकता है। अगर किसी समय पृथ्वी की लगभग पूरी बर्फ पिघल जाती है, तो समुद्र का औसत जलस्तर करीब 216 फीट तक बढ़ सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर समुद्र के किनारे बसे शहरों और तटीय क्षेत्रों पर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में धरती का औसत तापमान भी मौजूदा करीब 58 डिग्री फारेनहाइट से बढ़कर लगभग 80 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंचने की संभावना बताई गई है।
भारत और बांग्लादेश पर कितना असर
एशिया में समुद्र के बढ़ते जलस्तर से बड़े पैमाने पर तटीय भूमि प्रभावित होगी। बांग्लादेश का लगभग पूरा हिस्सा पानी में डूबने की स्थिति में आ सकता है, जबकि भारत के बड़े तटीय इलाकों पर भी समुद्र का पानी पहुंच सकता है। चीन की करीब 60 करोड़ आबादी वाली भूमि के जलमग्न होने का भी अनुमान बताया गया है। मेकांग डेल्टा के डूबने से कंबोडिया के कुछ हिस्से अलग-थलग पड़ सकते हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये हजारों वर्षों में अत्यधिक बर्फ पिघलने की संभावित स्थिति का परिदृश्य है, न कि निकट भविष्य का अनुमान।
उत्तरी अमेरिका का बदल जाएगा नक्शा
बर्फ पूरी तरह पिघलने की स्थिति में उत्तरी अमेरिका के अटलांटिक तट का बड़ा हिस्सा समुद्र में समा सकता है। फ्लोरिडा और गल्फ कोस्ट क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित होंगे। कैलिफोर्निया में सैन फ्रांसिस्को के आसपास की पहाड़ियां द्वीपों में बदल सकती हैं, जबकि सेंट्रल वैली एक विशाल खाड़ी का रूप ले सकती है। सैन डिएगो जैसे तटीय क्षेत्र भी प्रभावित होंगे।

दक्षिण अमेरिका में भी डूबेंगे बड़े इलाके
दक्षिण अमेरिका में अमेजन बेसिन और पराग्वे नदी बेसिन के बड़े हिस्से समुद्री खाड़ियों में बदल सकते हैं। ब्यूनस आयर्स, तटीय उरुग्वे और पराग्वे के बड़े हिस्से पर भी समुद्री जल का असर पड़ सकता है। वहीं कैरिबियन तट और मध्य अमेरिका के कुछ पहाड़ी क्षेत्र अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं।
अफ्रीका में गर्मी बनेगी बड़ी चुनौती
समुद्र का जलस्तर बढ़ने से अफ्रीका में दूसरे महाद्वीपों की तुलना में अपेक्षाकृत कम भूमि डूबने का अनुमान है। लेकिन तापमान में भारी वृद्धि के कारण महाद्वीप का बड़ा हिस्सा इंसानी जीवन के लिए मुश्किल हो सकता है। मिस्र में अलेक्जेंड्रिया और काहिरा जैसे क्षेत्र भी बढ़ते भूमध्य सागर के पानी से प्रभावित हो सकते हैं।
यूरोप के कई शहरों पर मंडराएगा खतरा
यूरोप के कई प्रमुख तटीय शहरों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। लंदन और वेनिस जैसे शहर बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होंगे। नीदरलैंड्स और डेनमार्क का बड़ा हिस्सा समुद्र के बढ़ते जलस्तर की चपेट में आ सकता है। भूमध्य सागर के बढ़ते पानी का असर काला सागर और कैस्पियन सागर के जलस्तर पर भी पड़ सकता है।
ऑस्ट्रेलिया को भी गंवानी पड़ेगी बड़ी तटीय जमीन
ऑस्ट्रेलिया के लिए भी समुद्र का बढ़ता जलस्तर गंभीर चुनौती बनेगा। देश के अंदरूनी हिस्सों में नया समुद्री क्षेत्र बन सकता है, लेकिन जिस संकरी तटीय पट्टी में बड़ी आबादी रहती है, उसका बड़ा हिस्सा जलमग्न हो सकता है।
अंटार्कटिका की बर्फ सबसे बड़ी चिंता
पूर्वी अंटार्कटिका में धरती की कुल बर्फ का लगभग चार-पांचवां हिस्सा मौजूद है। इसका विशाल आकार इसे लंबे समय तक स्थिर रख सकता है, लेकिन अगर पृथ्वी का तापमान बहुत पुराने गर्म दौर जैसी स्थिति में पहुंचता है, तो इसके पिघलने का खतरा भी बढ़ सकता है।
दूसरी ओर, वेस्ट अंटार्कटिक आइस शीट को अधिक संवेदनशील माना जाता है। इसका बड़ा हिस्सा समुद्र के स्तर से नीचे मौजूद चट्टानों पर टिका है। गर्म समुद्री पानी इसके तैरते हिस्से को नीचे से पिघला सकता है, जिससे बर्फ की चादर अस्थिर हो सकती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 1992 से वेस्ट अंटार्कटिका में हर साल औसतन करीब 65 मिलियन मीट्रिक टन बर्फ कम होने की बात सामने आई है।
नेपाल की बाढ़ ने फिर बढ़ाई जलवायु चिंता
नेपाल और तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से जुड़ी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम और ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ाई है। हालांकि नेपाल की एक बाढ़ और धरती की पूरी बर्फ के पिघलने जैसे हजारों साल के संभावित परिदृश्य को सीधे एक ही घटना के परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। फिर भी वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के लिए बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पीछे हटना और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि लंबे समय से महत्वपूर्ण जलवायु संकेतक बने हुए हैं।
