भारत में सांप के काटने से होने वाली मौतों को कम करने की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया है। शोधकर्ताओं ने पांच नैनोबॉडी से तैयार नया एंटीवेनम विकसित किया है, जिसे कोबरा और किंग कोबरा के जहर में मौजूद खतरनाक टॉक्सिन को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। इस एंटीवेनम का फिलहाल चूहों पर परीक्षण किया गया है। प्रयोग में इसने अलग-अलग क्षेत्रों से लिए गए कई सांपों के जहर के खिलाफ सुरक्षा देने की क्षमता दिखाई।
अलग-अलग इलाकों के सांपों के जहर पर हुआ परीक्षण
इस रिसर्च की खास बात यह रही कि वैज्ञानिकों ने भारत के अलग-अलग हिस्सों से लिए गए सांपों के जहर के नमूनों का इस्तेमाल किया। इनमें मोनोकल्ड कोबरा, स्पेक्टेकल्ड कोबरा और भारत में पाए जाने वाले किंग कोबरा के जहर शामिल थे। शोध में वेस्टर्न घाट्स और नॉर्थईस्ट इंडिया जैसे अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से लिए गए जहर के नमूनों को भी शामिल किया गया। इसका उद्देश्य यह देखना था कि नया एंटीवेनम अलग-अलग क्षेत्रों के सांपों के जहर पर कितना प्रभावी हो सकता है।
पांच नैनोबॉडी को मिलाकर तैयार किया गया एंटीवेनम
वैज्ञानिकों ने पांच विशेष नैनोबॉडी को मिलाकर यह एंटीवेनम तैयार किया है। नैनोबॉडी एंटीबॉडी के बेहद छोटे हिस्से होते हैं, जिन्हें खास टॉक्सिन को पहचानकर उन्हें निशाना बनाने के लिए तैयार किया जा सकता है। यह एंटीवेनम जहर में मौजूद तीन प्रमुख टॉक्सिन के खिलाफ विकसित किया गया है। इनमें अल्फा-न्यूरोटॉक्सिन, साइटोटॉक्सिन और फॉस्फोलिपेज ए2 शामिल हैं। इन टॉक्सिन की वजह से नसों और मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है। गंभीर स्थिति में न्यूरोटॉक्सिन के कारण लकवे जैसी समस्या और अन्य टॉक्सिन के कारण टिश्यू को नुकसान हो सकता है।
चूहों पर टेस्ट में मिली सफलता
वैज्ञानिकों ने तैयार एंटीवेनम को अलग-अलग सांपों के जहर के खिलाफ चूहों पर परीक्षण किया। परीक्षण में पांच नैनोबॉडी वाले एंटीवेनम ने मोनोकल्ड कोबरा, स्पेक्टेकल्ड कोबरा और किंग कोबरा के जहर से चूहों को बचाने की क्षमता दिखाई। इन नतीजों से वैज्ञानिकों को उम्मीद जगी है कि भविष्य में ऐसा एंटीवेनम विकसित किया जा सकता है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में पाए जाने वाले कई सांपों के जहर के खिलाफ प्रभावी हो।
मौजूदा एंटीवेनम में क्या चुनौती है
फिलहाल सांप के काटने के इलाज में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर एंटीवेनम घोड़ों से प्राप्त एंटीबॉडी की मदद से तैयार किए जाते हैं। ये एंटीवेनम लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे हैं और कई लोगों की जान बचाते हैं। हालांकि, कुछ मरीजों में इनके इस्तेमाल से एलर्जी जैसी प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। इसके अलावा, अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाने वाले सांपों के जहर की संरचना में अंतर हो सकता है। ऐसे में एक क्षेत्र के लिए तैयार एंटीवेनम दूसरे क्षेत्र के सांप के जहर के खिलाफ समान प्रभाव नहीं दिखा सकता।
अभी इंसानों पर इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं
नया पांच-नैनोबॉडी एंटीवेनम अभी मानव उपचार के लिए उपलब्ध नहीं है। अब तक इसका परीक्षण चूहों पर ही किया गया है। इंसानों में इस्तेमाल से पहले इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता की जांच के लिए कई और परीक्षण जरूरी होंगे। इसके बाद मानवों पर क्लिनिकल ट्रायल की प्रक्रिया से गुजरना होगा। यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो यह तकनीक भारत में सांप के काटने के इलाज को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां सांपों के जहर में क्षेत्रीय अंतर अधिक पाया जाता है।
