संसद के मानसून सत्र के पांचवें दिन भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। विपक्ष के लगातार हंगामे के बीच केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में ‘वंदे मातरम्’ को कानूनी संरक्षण देने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण विधेयक पेश किया। बिल पेश होते ही विपक्षी सांसदों ने इसका विरोध शुरू कर दिया, जिससे सदन में शोर-शराबा बढ़ गया और अंततः राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित करनी पड़ी।
यह विधेयक संसद में पेश होते ही राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। जहां सरकार इसे राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इस पर विस्तृत चर्चा की मांग कर रहा है।
क्या है ‘वंदे मातरम्’ बिल?
प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य ‘वंदे मातरम्’ के सम्मान और गरिमा की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। बिल के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् का अपमान करता है, इसके गायन में बाधा उत्पन्न करता है या किसी को इसे गाने से रोकता है, तो उसे कानून के तहत दंडित किया जा सकेगा। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को मजबूत करने के लिए यह कानून आवश्यक है।
बिल के मसौदे में कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। यदि कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसे—
- 3 वर्ष तक की कैद
- आर्थिक जुर्माना
- या दोनों दंड एक साथ
दिए जा सकते हैं। अंतिम दंड का निर्धारण अदालत परिस्थितियों के आधार पर करेगी।
सरकारी कार्यक्रमों में नया नियम
प्रस्तावित कानून में सरकारी आयोजनों के लिए भी नए दिशा-निर्देश शामिल किए गए हैं। इसके तहत—
- सभी सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह पदों के गायन का प्रावधान किया गया है।
- राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम् का गायन अनिवार्य करने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
यदि यह विधेयक कानून बनता है तो इन प्रावधानों का पालन सरकारी संस्थानों और कार्यक्रमों में अनिवार्य हो सकता है।
विपक्ष ने किया जोरदार विरोध
विधेयक पेश होते ही विपक्षी दलों के सांसदों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। सदन में लगातार नारेबाजी और हंगामे के कारण कार्यवाही बाधित होती रही। विपक्ष का कहना था कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक चर्चा कराई जानी चाहिए।लगातार बढ़ते हंगामे को देखते हुए सभापति ने राज्यसभा की कार्यवाही सोमवार तक स्थगित कर दी।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक है तथा इसके सम्मान की रक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान होना आवश्यक है। सरकार का दावा है कि यह विधेयक किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के उद्देश्य से लाया गया है।
राज्यसभा में पेश होने के बाद विधेयक पर विस्तृत चर्चा और संशोधन की प्रक्रिया होगी। यदि यह बिल राज्यसभा और लोकसभा दोनों से पारित हो जाता है तथा राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है, तो यह कानून का रूप ले लेगा।
फिलहाल यह विधेयक संसद और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस पर व्यापक बहस और विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।
