छत्तीसगढ़ के बस्तर में विकसित ‘नेचुरल ग्रीनहाउस’ (प्राकृतिक ग्रीनहाउस) मॉडल को वैज्ञानिक स्तर पर महत्वपूर्ण मान्यता मिली है। प्रगतिशील किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी के शोधपत्र में इस नवाचार को संरक्षित खेती (Protected Cultivation) के प्रभावी और टिकाऊ विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
शोध के अनुसार, यह मॉडल पारंपरिक प्लास्टिक पॉलीहाउस की तुलना में कम लागत, अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल है। इससे किसानों को बेहतर उत्पादन के साथ दीर्घकालिक आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है।
क्या है नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल?
यह मॉडल बस्तर के मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म्स एंड रिसर्च सेंटर, कोंडागांव में विकसित किया गया है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें प्लास्टिक, कृत्रिम ढांचे या बिजली आधारित तापमान नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होती।
यह प्रणाली तेजी से बढ़ने वाले ऑस्ट्रेलियन टीक के पेड़ों और उच्च उत्पादकता वाली MDBP-16 काली मिर्च की किस्म पर आधारित बहुस्तरीय जीवित संरचना विकसित करती है, जो प्राकृतिक रूप से फसलों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है।
बिना प्लास्टिक और बिजली के बनता है अनुकूल वातावरण
शोध में बताया गया है कि पेड़ों की प्राकृतिक छत्रछाया से प्रकाश का संतुलित वितरण होता है, तापमान नियंत्रित रहता है और मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। साथ ही जैविक पोषक तत्वों का प्राकृतिक चक्र भी लगातार चलता रहता है।
इससे फसलों के लिए उपयुक्त माइक्रोक्लाइमेट तैयार होता है और किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत या प्लास्टिक संरचना की जरूरत नहीं पड़ती।
पॉलीहाउस के मुकाबले बेहद कम लागत
नेचुरल ग्रीनहाउस मॉडल की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसकी कम लागत शामिल है।
- पारंपरिक पॉलीहाउस की अनुमानित लागत: लगभग 40 लाख रुपये प्रति एकड़
- नेचुरल ग्रीनहाउस की लागत: करीब 1 से 1.5 लाख रुपये प्रति एकड़
इसके अलावा यह मॉडल 25 से 30 वर्षों तक उत्पादक बना रह सकता है, जिससे किसानों को लंबे समय तक लाभ मिलता है।
काली मिर्च उत्पादन में बेहतर परिणाम
इस मॉडल का स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षण आईसीएआर-भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (IISR), कोझिकोड और उसके मडिकेरी क्षेत्रीय केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने किया।
स्पाइस इंडिया (अप्रैल 2023) में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, इस प्रणाली में काली मिर्च की प्रत्येक बेल से 8 से 10 किलोग्राम सूखी काली मिर्च का उत्पादन प्राप्त हुआ। यह राष्ट्रीय औसत 1.5 से 2 किलोग्राम प्रति बेल की तुलना में कई गुना अधिक है।
किसानों और पर्यावरण दोनों को फायदा
शोध में कहा गया है कि यह मॉडल केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है। इससे—
- मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है।
- कार्बन अवशोषण बढ़ने से जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम करने में मदद मिलती है।
- भविष्य में इमारती लकड़ी से अतिरिक्त आय का स्रोत तैयार होता है।
- कम लागत में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती संभव होती है।
बड़े पैमाने पर अपनाने की संभावना
डॉ. राजाराम त्रिपाठी के अनुसार, प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित यह मॉडल वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ है। उनका मानना है कि उपयुक्त कृषि-जलवायु वाले क्षेत्रों में यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन और दीर्घकालिक आय का बेहतर विकल्प मिल सकता है।
