नक्सलवाद के बाद बदल रहा बस्तर

नक्सलवाद के बाद बदल रहा बस्तर

बस्तर, दंतेवाड़ा और जगदलपुर में नक्सलवाद के लंबे प्रभाव के बाद अब बदलाव की तस्वीर सुरक्षा अभियानों से आगे बढ़कर **सामान्य जीवन, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, कौशल प्रशिक्षण और पर्यटन** के रूप में दिखाई देने लगी है। कभी बंदूक और डर के लिए पहचाने जाने वाले इन इलाकों में अब बैंकिंग, रोजगार, हुनर और उम्मीद की नई कहानी लिखी जा रही है।

नेतानार के CRPF कैंप में बदली तस्वीर

CRPF कैंप की पहचान आमतौर पर ऊंची दीवारों, कंटीले तारों, बंकरों और हथियारबंद जवानों से होती है। ऐसे कैंपों के भीतर आम लोगों की आवाजाही की कल्पना भी मुश्किल होती है। लेकिन जगदलपुर जिले के नेतानार में एक ऐसा CRPF कैंप है, जिसके दरवाजे अब ग्रामीणों के लिए खुले हैं।

सुबह होते ही यहां गांव की महिलाएं पहुंचने लगती हैं। कोई सिलाई मशीन पर प्रशिक्षण ले रही है, तो कोई चावल और इमली के प्रसंस्करण का काम सीख रही है। कुछ महिलाएं बैंक सखी के रूप में ग्रामीणों के बैंक खातों में पैसे जमा और निकासी की सुविधा उपलब्ध करा रही हैं। वहीं ग्रामीण आधार कार्ड से जुड़े जरूरी कामों के लिए भी कैंप पहुंच रहे हैं।

 सुरक्षा और समाज के बीच घट रही दूरी

एक समय था जब नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा कैंपों के आसपास आम ग्रामीणों की मौजूदगी भी असामान्य मानी जाती थी। आज उन्हीं इलाकों में सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ता दिखाई दे रहा है।

नेतानार में खुली सुविधाएं इस बदलाव का एक अहम संकेत हैं। सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ स्थानीय लोगों को रोजगार, प्रशिक्षण और जरूरी सेवाओं से जोड़ने की कोशिशें ग्रामीणों के जीवन में नई संभावनाएं पैदा कर रही हैं।

 पूर्व नक्सलियों के लिए कौशल प्रशिक्षण

दंतेवाड़ा में भी बदलाव की तस्वीर दिखाई दे रही है। यहां पूर्व नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। उद्देश्य यही है कि हिंसा की राह छोड़ चुके लोग अपने हुनर के जरिए सम्मानजनक जीवन की शुरुआत कर सकें।

कौशल विकास के जरिए युवाओं को रोजगार से जोड़ना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

पर्यटन से भी बदल रही बस्तर की पहचान

बस्तर की पहचान अब सिर्फ नक्सलवाद से नहीं, बल्कि उसकी प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन क्षमता से भी होने लगी है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही इस बदलाव का अहम संकेत है।

बस्तर के जंगल, झरने, आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक विरासत पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। पर्यटन बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार और छोटे कारोबार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

बंदूक से बैंकिंग और डर से उम्मीद तक

बस्तर में बदलाव की यह कहानी सिर्फ सुरक्षा अभियानों की नहीं है। यह उस सामाजिक बदलाव की कहानी भी है, जिसमें ग्रामीण महिलाएं प्रशिक्षण ले रही हैं, बैंकिंग सेवाओं से जुड़ रही हैं, युवा कौशल सीख रहे हैं और पर्यटन के जरिए रोजगार की नई संभावनाएं तलाश रहे हैं।

कभी जहां बंदूक और डर की पहचान थी, वहां अब बैंकिंग, रोजगार, हुनर और उम्मीद की पहचान धीरे-धीरे मजबूत हो रही है। सुरक्षा के साथ विकास और लोगों की भागीदारी का यह मॉडल बस्तर के भविष्य के लिए एक नई तस्वीर पेश कर रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *