यूकेलिप्टस के पेड़ों से बढ़ी दुनिया की चिंता, भूजल और मिट्टी पर असर का खुलासा

यूकेलिप्टस के पेड़ों से बढ़ी दुनिया की चिंता, भूजल और मिट्टी पर असर का खुलासा

यूकेलिप्टस के पेड़ों को तेजी से बढ़ने और कागज उद्योग के लिए उपयोगी होने के कारण दुनिया के कई देशों में बड़े पैमाने पर लगाया गया है। लेकिन अब अलग-अलग देशों में हुए अध्ययनों ने इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ाई है। शोधों में यूकेलिप्टस के बड़े बागानों और भूजल की उपलब्धता, पानी के प्रवाह तथा मिट्टी के पोषक तत्वों के बीच संबंध सामने आया है। भारत में भी लंबे समय से यूकेलिप्टस की बड़े पैमाने पर खेती को लेकर पर्यावरणीय बहस होती रही है। अब ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे और रवांडा से सामने आए अध्ययन इस बहस को और व्यापक बना रहे हैं।

ब्राजील में भूजल स्तर में बड़ी गिरावट

दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील में यूकेलिप्टस उद्योग का विस्तार मुख्य रूप से तेजी से पेड़ उगाने, उन्हें लुगदी के लिए इस्तेमाल करने और कागज उद्योग के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुआ।

हालांकि, वैज्ञानिक अध्ययनों में यूकेलिप्टस के बड़े बागानों वाले इलाकों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता सामने आई है। मिनास गैरेस के एक यूकेलिप्टस क्षेत्र में करीब 45 वर्षों के दौरान भूजल स्तर 4.5 मीटर तक नीचे जाने की बात अध्ययन में सामने आई। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर ऐसे क्षेत्रों को ‘हरा रेगिस्तान’ कहा जाने लगा है।

अर्जेंटीना में आसपास से भी खिंच रहा भूजल

अर्जेंटीना के पम्मास घास के मैदानों में भी यूकेलिप्टस के बागानों को लेकर अध्ययन किया गया। मध्य अर्जेंटीना के फ्लडिंग पम्मास क्षेत्र में करीब 40 हेक्टेयर के बागान का अध्ययन हुआ, जिसे 1951 में लगाया गया था।

दो साल के अध्ययन में पाया गया कि घास के मैदानों की तुलना में यूकेलिप्टस वाले क्षेत्र में भूजल स्तर 0.5 मीटर से अधिक नीचे था। अध्ययन में यह भी संकेत मिला कि बागान के नीचे भूजल स्तर में अंतर के कारण आसपास के घास के मैदानों से पानी क्षैतिज रूप से यूकेलिप्टस वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित हो सकता है। यानी इसका प्रभाव केवल पेड़ों के नीचे मौजूद पानी तक सीमित नहीं रह सकता।

उरुग्वे में 17 साल बाद 35% पानी की कमी

उरुग्वे में भी लंबे समय तक पानी की उपलब्धता पर यूकेलिप्टस और पाइन के बागानों के प्रभाव का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2000 से दो आसपास के वॉटरशेड पर निगरानी रखी। इनमें से एक क्षेत्र को चारागाह के रूप में बनाए रखा गया, जबकि दूसरे में यूकेलिप्टस और पाइन के पेड़ लगाए गए। अध्ययन के अनुसार, पेड़ लगाए जाने के करीब 17 साल बाद जंगल वाले वॉटरशेड में घास के मैदान की तुलना में पानी की उपलब्धता 35% कम पाई गई।

रवांडा में मिट्टी की गुणवत्ता पर चिंता

पूर्वी अफ्रीका के रवांडा में हुए अध्ययनों में यूकेलिप्टस के मिट्टी और पानी पर प्रभाव को लेकर भी चिंता सामने आई। शोधकर्ताओं के अनुसार, यूकेलिप्टस बड़ी मात्रा में मिट्टी से पोषक तत्व ग्रहण कर सकता है, जिससे लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है। रवांडा में यूकेलिप्टस प्रमुख बागान प्रजातियों में शामिल हो गया है। अध्ययन के अनुसार, वन बागानों में यूकेलिप्टस की हिस्सेदारी करीब 78% थी।

1970 के दशक में हजारों हेक्टेयर में फैले थे बागान

अध्ययन में बताया गया है कि 1970 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया, रवांडा, युगांडा, केन्या और सूडान में यूकेलिप्टस के बागान कुल करीब 95,684 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले थे। इसमें अकेले रवांडा का हिस्सा लगभग 23,000 हेक्टेयर था।

क्या हर जगह यूकेलिप्टस नुकसानदायक है

यूकेलिप्टस को लेकर वैज्ञानिक निष्कर्षों को स्थानीय परिस्थितियों के संदर्भ में समझना जरूरी है। पानी की उपलब्धता, मिट्टी, वर्षा, पेड़ों की घनत्व और जमीन के इस्तेमाल जैसे कई कारक इसके प्रभाव को बदल सकते हैं।

इसलिए किसी क्षेत्र में यूकेलिप्टस के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन वहां की स्थानीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर करना अधिक उचित है। हालांकि, बड़े पैमाने पर लगाए गए यूकेलिप्टस बागानों के जल संसाधनों और मिट्टी की गुणवत्ता पर संभावित असर को लेकर सामने आए आंकड़े पर्यावरण प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण सवाल जरूर उठाते हैं।

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