पहले पति की आय-खर्च का होगा आकलन, सरकारी नौकरी वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता

पहले पति की आय-खर्च का होगा आकलन, सरकारी नौकरी वाली पत्नी को नहीं मिलेगा गुजारा भत्ता

Alimony Law Changes High Court को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी मामले में भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की राशि तय करने से पहले पति की वास्तविक आय, खर्च, कर्ज और उस पर आश्रित लोगों की संख्या का उचित आकलन किया जाए। अदालत ने कहा कि बिना पर्याप्त जांच के तय की गई मेंटेनेंस राशि न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।

पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति जानना जरूरी

जबलपुर हाईकोर्ट में एक महिला द्वारा भरण-पोषण की मांग को लेकर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट को केवल अनुमान के आधार पर गुजारा भत्ता तय नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पति की वास्तविक आय, मासिक खर्च, वित्तीय दायित्व, कर्ज और परिवार पर निर्भर सदस्यों का रिकॉर्ड एकत्र करने के बाद ही मेंटेनेंस की राशि निर्धारित की जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उचित जांच के बिना भरण-पोषण का आदेश पारित किया गया है, तो ऐसे आदेश की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।

सरकारी नौकरी करने वाली पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता नहीं

इससे पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने भी एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि यदि पत्नी सरकारी नौकरी में है और उसकी आय स्वयं के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है, तो वह पति से अंतरिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि दंपति की नाबालिग संतान है, तो पिता उसकी शिक्षा, पालन-पोषण और अन्य आवश्यक खर्चों की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। बच्चे की जिम्मेदारी दोनों अभिभावकों की आय से अलग कानूनी दायित्व है।

फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से जरूरतमंद पक्ष को मुकदमे की अवधि के दौरान राहत प्रदान करना है। अदालत ने पाया कि संबंधित फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की आय और वित्तीय दायित्वों का उचित मूल्यांकन किया था।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति और पत्नी दोनों की पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही निचली अदालत को निर्देश दिया कि मुख्य मामले का अंतिम निपटारा छह महीने के भीतर किया जाए।

हाईकोर्ट के फैसले का क्या असर होगा?

इस फैसले के बाद भविष्य में भरण-पोषण से जुड़े मामलों में अदालतें पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति का विस्तृत आकलन करने पर अधिक जोर देंगी। वहीं, यदि पत्नी स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम है और सरकारी सेवा में कार्यरत है, तो उसे केवल सरकारी नौकरी होने के बावजूद स्वतः अंतरिम गुजारा भत्ता मिलने का अधिकार नहीं माना जाएगा। हालांकि, प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही किया जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *