राजस्थान में बर्फ नहीं, मार्बल की सफेद चादर! रोज 5500 टन स्लरी से बना अनोखा टूरिस्ट स्पॉट

राजस्थान में बर्फ नहीं, मार्बल की सफेद चादर! रोज 5500 टन स्लरी से बना अनोखा टूरिस्ट स्पॉट

राजस्थान का किशनगढ़ अपने मार्बल कारोबार के लिए दुनियाभर में पहचान रखता है, लेकिन अब यहां की एक जगह अपनी अजीबोगरीब खूबसूरती के कारण सोशल मीडिया पर चर्चा में है। दूर से देखने पर यह इलाका बर्फ से ढकी जमीन जैसा नजर आता है, जबकि असल में यहां मार्बल कचरे और स्लरी का बड़ा डंपिंग एरिया है। सफेद रंग की मोटी परत के कारण यह जगह अब पर्यटकों, कपल्स और फोटो-वीडियो शूट करने वालों को आकर्षित कर रही है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो वायरल होने के बाद यहां आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है।

82 एकड़ में फैला है मार्बल स्लरी का डंपिंग एरिया

किशनगढ़ में मार्बल से निकलने वाली स्लरी को एक बड़े क्षेत्र में जमा किया जाता है। बताया जाता है कि यह इलाका करीब 82 एकड़ में फैला है, जहां हर दिन 5500 टन से ज्यादा मार्बल स्लरी पहुंचती है। यह स्लरी आसपास की 1200 से अधिक मार्बल यूनिट्स से निकलती है। मार्बल की कटिंग और पॉलिशिंग के दौरान पानी के साथ पत्थर के बेहद महीन कण मिल जाते हैं। यही मिश्रण सूखने के बाद जमीन पर सफेद परत बना देता है।

पानी सूखते ही दिखने लगती है बर्फ जैसी जमीन

मार्बल की कटिंग के दौरान बनने वाली स्लरी में पानी और पत्थर के महीन कण होते हैं। जब डंपिंग एरिया में जमा स्लरी का पानी धीरे-धीरे सूख जाता है, तो पीछे सफेद रंग के बारीक पत्थर के कण रह जाते हैं। इन कणों की मोटी परत दूर से देखने पर बर्फ जैसी दिखाई देती है। यही अनोखा नजारा अब सोशल मीडिया यूजर्स को आकर्षित कर रहा है।

https://images.openai.com/static-rsc-4/c4E0iNmGO8NOoB4geWLR8OWhv6DaiqhaaEnDN2Jfki--lcUIyy2Q-fmyKejHydkpas3G6gLn-Vxm8ojIBddLsnyJjK-5uFhsC7s-lUr3SItpiy4ZG0QncteqIYER5wKxyGT9d7dDSuu9OeIVoRiVKqvEb-rPe4ik1llEal_4XzqOtwXlrZQKLJdDhkhZgDZj?purpose=fullsize

प्री-वेडिंग शूट से लेकर फिल्म शूट तक

सोशल मीडिया पर इस सफेद जमीन की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद किशनगढ़ का यह इलाका अलग तरह से लोकप्रिय हो गया है। लोग यहां फोटो और वीडियो बनाने पहुंच रहे हैं। कई कपल्स इसे प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा फिल्म और म्यूजिक वीडियो बनाने वाले लोगों के लिए भी सफेद मार्बल का यह विशाल क्षेत्र एक अलग तरह का बैकग्राउंड उपलब्ध कराता है।

https://images.openai.com/static-rsc-4/nyuN3spGp_dezl-CYDIpzAcBpofN2oxjwHzb9BRqUqwHJeo2VTma38h-ljgV_grXwbuAhoxhRSyCf2nF-qo1ZUo7GxNgsSDg-9-nARhTJ-wEmYiWatE9SFKK4IzcUcOkDX8I85IOXmPBeXuHjQzxJOdDPDp6_bZf84aRuv_Kgm4KwenUdTaUMLw6XIQiZoHH?purpose=fullsize

किशनगढ़ में क्यों बनती है इतनी मार्बल स्लरी

किशनगढ़ राजस्थान के प्रमुख मार्बल कारोबार केंद्रों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में मार्बल की कटिंग, पॉलिशिंग और प्रोसेसिंग यूनिट्स संचालित होती हैं। मार्बल को काटने और चमकाने के दौरान पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में पत्थर के बारीक कण पानी के साथ मिलकर स्लरी का रूप ले लेते हैं। बाद में इस स्लरी को निर्धारित डंपिंग क्षेत्र में जमा किया जाता है।

सफेद खूबसूरती के पीछे पर्यावरण की चिंता

हालांकि यह जगह देखने में आकर्षक लगती है, लेकिन इसके पीछे पर्यावरण से जुड़ी गंभीर चिंताएं भी हैं। स्लरी के सूखने के बाद इसके बेहद महीन कण हवा में उड़ सकते हैं, जिससे आसपास धूल और वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका रहती है। खुले क्षेत्र में बड़ी मात्रा में मार्बल कचरा जमा होने से जमीन और भूजल पर भी संभावित असर को लेकर चिंता रहती है। इसलिए इस तरह के औद्योगिक कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन जरूरी है।

यह भी पढ़ें:- अगस्त में आसमान होगा लाल! Blood Moon का दिखेगा अद्भुत नजारा

मार्बल कचरे का हो सकता है दोबारा इस्तेमाल

मार्बल स्लरी को केवल कचरे के रूप में डंप करने के बजाय इसके पुन: उपयोग के विकल्प तलाशे जा सकते हैं। निर्माण सामग्री और अन्य औद्योगिक उपयोगों में मार्बल कचरे के इस्तेमाल से डंपिंग की मात्रा कम करने में मदद मिल सकती है। इससे एक तरफ कचरे का बेहतर प्रबंधन होगा, वहीं दूसरी तरफ जमीन, हवा और पानी पर पड़ने वाले संभावित पर्यावरणीय प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा।

सोशल मीडिया ने बदल दी इस जगह की पहचान

किशनगढ़ की यह सफेद जमीन आज सोशल मीडिया की वजह से एक अनोखे टूरिस्ट स्पॉट के रूप में पहचान बना रही है। लोग इसे देखकर बर्फीली जगह समझ लेते हैं, लेकिन वास्तविकता में यह मार्बल स्लरी का विशाल डंपिंग एरिया है। यानी जिस सफेद नजारे को लोग कैमरे में कैद करने पहुंच रहे हैं, उसके पीछे हर दिन हजारों टन औद्योगिक कचरे की कहानी भी छिपी है। ऐसे में किशनगढ़ की यह जगह जितनी आकर्षक नजर आती है, उतना ही जरूरी इसके पर्यावरणीय प्रभाव और कचरा प्रबंधन को समझना भी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *