जांच में भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों के कथित उल्लंघन, साक्षात्कार के अंकों में हेरफेर, आरक्षण संबंधी प्रावधानों की अनदेखी और चयन समिति के सदस्यों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने जैसे आरोप सामने आए हैं। अब मामले में न्यायालय के समक्ष आगे की कानूनी प्रक्रिया चलेगी।
1998 की भर्ती से जुड़ा है मामला
यह मामला 25 दिसंबर 1998 को पंडरिया जनपद पंचायत में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के 320 पदों पर हुई भर्ती से जुड़ा है। भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए तत्कालीन जनपद पंचायत अध्यक्ष अर्जुन तिवारी ने शिकायत की थी।
शिकायत में साक्षात्कार पंजी में काट-छांट, नियमित छात्र के रूप में महाविद्यालयों में पढ़ रहे अभ्यर्थियों को अध्यापन अनुभव के अंक देने, आरक्षण नियमों के उल्लंघन और चयन समिति के सदस्यों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगाए गए थे।
इस शिकायत के आधार पर वर्ष 2000 में अपराध क्रमांक 48/2000 दर्ज कर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत जांच शुरू की गई थी।
मेरिट सूची और आरक्षण प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप
जांच के अनुसार, भर्ती नियमों के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की अलग-अलग मेरिट सूची तैयार की जानी थी। प्रत्येक वर्ग में उपलब्ध पदों की संख्या के तीन गुना अभ्यर्थियों को निर्धारित योग्यताक्रम के आधार पर परीक्षा या साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था।
आरोप है कि साक्षात्कार के लिए बनाई गई सूची में शैक्षणिक अंकों के साथ अध्यापन अनुभव के बोनस अंक भी जोड़ दिए गए। इससे अभ्यर्थियों का योग्यताक्रम प्रभावित हुआ। जांच एजेंसी के मुताबिक, कुछ पात्र अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया, जबकि निर्धारित योग्यताक्रम के अनुसार पात्र नहीं माने जाने वाले कुछ अभ्यर्थियों को प्रक्रिया में शामिल किया गया।
जांच में महिला आरक्षण, दिव्यांग अभ्यर्थियों के चयन और विभिन्न वर्गों के समायोजन में भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने की बात सामने आई। अभिलेखों के अनुसार, अनुसूचित जाति के दिव्यांग वर्ग के चार पदों के लिए 12 अभ्यर्थियों को बुलाया जाना था, लेकिन 15 अभ्यर्थियों में से केवल 10 को ही साक्षात्कार के लिए बुलाया गया।
चयन समिति के सदस्यों के रिश्तेदारों को लाभ देने का आरोप
विवेचना में तत्कालीन शिक्षा स्थायी समिति अध्यक्ष शंकरलाल चंद्रवंशी और सदस्यों बृजबिहारी वैष्णव तथा अंबिकादत्त शर्मा के रिश्तेदारों के भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की बात सामने आई।
आरोप है कि संबंधित समिति सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों के साक्षात्कार के दौरान मौजूद रहकर उन्हें अंक दिए। जांच में यह भी सवाल उठाया गया कि साक्षात्कार से पहले रिश्तेदारों के अभ्यर्थी होने की जानकारी घोषित नहीं की गई थी।
इसके अलावा, कुछ अभ्यर्थियों के अध्यापन अनुभव प्रमाणपत्रों की वैधता पर भी सवाल उठे। जांच एजेंसी के अनुसार, कुछ दस्तावेजों में संबंधित अभ्यर्थियों को अनुभव की अवधि के दौरान महाविद्यालयों में नियमित छात्र बताया गया था और उन्हें छात्रवृत्ति मिलने की जानकारी भी सामने आई। इसके बावजूद उन्हें अध्यापन अनुभव के अंक दिए जाने का आरोप है।
इन तत्कालीन अधिकारियों और सदस्यों के नाम शामिल
पेश किए गए चालान में जनपद पंचायत पंडरिया के तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी एम.एल. भारती और अंबिका प्रसाद शांडिल्य, तत्कालीन विकासखंड शिक्षा अधिकारी एन.एल. वस्त्रकार, तत्कालीन उप संचालक लोक शिक्षण एन.आर. वर्मा, तत्कालीन शिक्षा स्थायी समिति अध्यक्ष शंकरलाल चंद्रवंशी और तत्कालीन सदस्य हरिराम घृतलहरे सहित 16 चयनित अभ्यर्थियों को आरोपी बनाया गया है।
मूल विवरण में कुछ अन्य तत्कालीन अधिकारियों और समिति सदस्यों के नाम भी दर्ज हैं। इनमें तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी एम.एल. बढ़ई तथा शिक्षा स्थायी समिति के सदस्य बृजबिहारी वैष्णव और अंबिकादत्त शर्मा शामिल बताए गए हैं। जानकारी के अनुसार, इन तीनों की मृत्यु हो चुकी है।
