छत्तीसगढ़ के 1649 स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत…

छत्तीसगढ़ के 1649 स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत…

स्वतंत्रता दिवस आते ही देश उन लाखों वीरों को याद करता है, जिन्होंने आजादी के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे हजारों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया और कई ने जेल की यातनाएं भी सहीं। लेकिन आज उनकी विरासत को संभाल रहे कई परिवार खुद संघर्ष और आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के 1649 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में अब कोई भी जीवित नहीं है। उनके परिवारों का कहना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी कई जगह उन्हें अपेक्षित सरकारी सहयोग नहीं मिल पाया है। कुछ परिवार खेती या छोटे कारोबार के सहारे जीवन चला रहे हैं, तो कुछ रोजगार और शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं की कमी की बात कहते हैं।

16 साल की उम्र में सत्याग्रह से जुड़े थे नागरदास बाबरिया

रायपुर के नागरदास बाबरिया कम उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। बताया जाता है कि महज 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने सत्याग्रह में हिस्सा लिया। अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेजा तो उन्होंने अपने साथियों के साथ जेल से भागने की कोशिश की। उनके बेटे मुकेश का कहना है कि वह पिछले करीब नौ वर्षों से अपने पिता की प्रतिमा स्थापित कराने के लिए प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं। परिवार प्रतिमा स्थापना का खर्च खुद उठाने को तैयार है, लेकिन अनुमति मिलने में लगातार दिक्कत आ रही है।

दौलतराम साहू का परिवार खेती और छोटी दुकान पर निर्भर

देवादा के दौलतराम साहू ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ग्रामीणों को संगठित किया और विदेशी सामान के बहिष्कार का नेतृत्व किया था। आज उनके परिवार के करीब 10 सदस्य लगभग ढाई एकड़ जमीन और छोटी किराना दुकान पर निर्भर हैं। उनके पोते अनिल के मुताबिक, दादी के निधन के बाद मिलने वाली 9 हजार रुपये की पेंशन भी बंद हो गई। परिवार का दावा है कि रोजगार और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्हें किसी विशेष सुविधा का लाभ नहीं मिला।

केजऊ कोटवार के परिवार के सामने जमीन का संकट

देवादा के ही केजऊ कोटवार ने अंग्रेजों को लगान नहीं देने और स्वदेशी अपनाने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया था। इस गतिविधि के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उनके परपोते रविंद्र कामड़े के अनुसार, परिवार के पास करीब 2.20 एकड़ सेवाभूमि थी, जिसमें से 20 डिसमिल जमीन भारतमाला परियोजना के लिए चली गई। अब लगभग दो एकड़ जमीन ही परिवार की आजीविका का प्रमुख साधन है। परिवार का यह भी कहना है कि बुजुर्ग सदस्य को मिलने वाली सामाजिक सहायता पेंशन बंद हो चुकी है।

पान ठेले के सहारे चल रहा शिवदयाल चंद्राकर का परिवार

पाटन के सांतरा गांव के शिवदयाल चंद्राकर भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े सक्रिय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनकी बहू फालगी बाई के अनुसार, परिवार वर्तमान में एक छोटे पान ठेले के सहारे जीवन चला रहा है। रोजगार की तलाश में परिवार के कई सदस्य रायपुर जाने को मजबूर हैं। परिवार का दावा है कि उन्हें अब तक किसी सरकारी योजना का सीधा लाभ नहीं मिल पाया है।

कालीचरण तिवारी ने 16 साल की उम्र में उठाई थी आवाज

बिलासपुर के कालीचरण तिवारी भी कम उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे। बताया जाता है कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर झंडा फहराने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था। उनके पोते संकल्प के मुताबिक, परिवार की पिछली पीढ़ी को सम्मान निधि और रेल यात्रा जैसी कुछ सुविधाएं मिलती थीं। हालांकि, वर्तमान पीढ़ी को इलाज और शिक्षा के क्षेत्र में किसी विशेष प्राथमिकता या आरक्षण का लाभ नहीं मिलने की बात परिवार की ओर से कही गई है।

पं. रामगोपाल तिवारी ने 1930 में तोड़ा था नमक कानून

पं. रामगोपाल तिवारी ने वर्ष 1930 में नमक कानून तोड़ने के आंदोलन में हिस्सा लिया था। इसके अलावा 1947 में उन्होंने अपने क्षेत्र में पहला तिरंगा फहराया था। उनके पौत्र अनिल के अनुसार, उनकी दादी बृजरानी ने कभी सम्मान निधि या पेंशन स्वीकार नहीं की। परिवार का कहना है कि उन्होंने देश के लिए किए गए योगदान के बदले सरकार से व्यक्तिगत सुविधा या किसी विशेष लाभ की मांग नहीं की।

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