Headlines

वैज्ञानिकों ने खोजा कोशिकाओं की सफाई का तरीका, LC3 प्रोटीन से कंट्रोल होगी प्रक्रिया

LC3 प्रोटीन के जरिए कोशिकाओं की ऑटोफैगी प्रक्रिया को नियंत्रित करने पर शोध ऑटोफैगी और LC3 प्रोटीन पर वैज्ञानिकों की नई रिसर्च

वैज्ञानिकों ने कोशिकाओं की प्राकृतिक ‘सफाई व्यवस्था’ यानी ऑटोफैगी (Autophagy) को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण खोज की है। नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दिखाया कि LC3 नाम के प्रोटीन में बदलाव करके ऑटोफैगी की गतिविधि को बढ़ाया या घटाया जा सकता है। इससे भविष्य में कैंसर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों में कोशिकीय सफाई प्रक्रिया की भूमिका को समझने के लिए नए शोध के रास्ते खुल सकते हैं।

ये है ऑटोफैगी

ऑटोफैगी कोशिकाओं की एक तरह की रीसाइक्लिंग प्रक्रिया है। इसमें कोशिका अपने भीतर मौजूद खराब या अनावश्यक प्रोटीन, क्षतिग्रस्त हिस्सों और दूसरे सेलुलर मटेरियल को एक संरचना में इकट्ठा करती है।

इस संरचना को ऑटोफैगोसोम (Autophagosome) कहा जाता है। इसे कोशिका की ‘रीसाइक्लिंग बिन’ की तरह समझा जा सकता है। इसके भीतर मौजूद सामग्री को आगे तोड़ा जाता है और उसके कुछ हिस्सों का इस्तेमाल ऊर्जा या दूसरे सेलुलर कामों के लिए किया जा सकता है।

LC3 प्रोटीन पर केंद्रित रहा शोध

शोधकर्ताओं ने ऑटोफैगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले LC3 प्रोटीन के व्यवहार का अध्ययन किया। कंप्यूटर सिमुलेशन और प्रयोगों के जरिए उन्होंने देखा कि जब LC3 ऑटोफैगोसोम की झिल्ली से संपर्क करता है, तो उसकी संरचना में बड़ा बदलाव आता है।

अध्ययन के अनुसार, यह संरचनात्मक बदलाव LC3 को ऑटोफैगी से जुड़े दूसरे अणुओं के साथ काम करने में सक्षम बनाता है।

वैज्ञानिकों ने LC3 में किए बदलाव

शोधकर्ताओं ने LC3 के कुछ हिस्सों में बदलाव यानी म्यूटेशन करके इसके अलग-अलग रूप तैयार किए। प्रयोगों में इन रूपों ने ऑटोफैगी की गतिविधि पर अलग-अलग प्रभाव दिखाया।

कुछ संशोधित LC3 रूपों के साथ ऑटोफैगी की गतिविधि काफी बढ़ी, जबकि दूसरे रूप में यह काफी कम देखी गई। इसी वजह से शोधकर्ताओं ने इसे ऑटोफैगी को नियंत्रित करने वाली संभावित मॉलिक्यूलर स्विच की दिशा में अहम निष्कर्ष माना है।

इन संस्थानों ने की रिसर्च

यह अध्ययन CSIR-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (CSIR-IGIB), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी, अशोका यूनिवर्सिटी और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिलिस (UCLA) के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया।

अध्ययन के निष्कर्ष अगस्त 2026 में Nature Communications में प्रकाशित हुए।

कैंसर और पार्किंसंस रिसर्च में क्या अहम है

ऑटोफैगी का संबंध कई बीमारियों में कोशिकीय स्तर पर होने वाली प्रक्रियाओं से है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, कैंसर और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों, जिसमें पार्किंसंस भी शामिल है, में ऑटोफैगी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि नई खोज से इन बीमारियों का इलाज मिल गया है। फिलहाल यह बुनियादी और प्री-क्लिनिकल स्तर की रिसर्च है, जिसका इस्तेमाल बीमारी से जुड़ी कोशिकीय प्रक्रियाओं को समझने और आगे संभावित उपचार रणनीतियां विकसित करने में हो सकता है।

इंटरमिटेंट फास्टिंग और ऑटोफैगी

ऑटोफैगी को लेकर इंटरमिटेंट फास्टिंग की भी अक्सर चर्चा होती है। लंबे समय तक भोजन न मिलने पर ग्लूकोज और अमीनो एसिड का स्तर कम होने से शरीर में ऊर्जा संरक्षण से जुड़ी प्रक्रियाएं सक्रिय हो सकती हैं और ऑटोफैगी प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, इस अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष इंटरमिटेंट फास्टिंग नहीं, बल्कि LC3 प्रोटीन के आणविक व्यवहार और ऑटोफैगी को नियंत्रित करने की उसकी संभावित भूमिका से जुड़ा है।

अब शरीर की सफाई बाहर से नियंत्रित की जा सकेगी

शोध से यह संकेत मिलता है कि ऑटोफैगी की गतिविधि को आणविक स्तर पर नियंत्रित करना संभव हो सकता है। लेकिन इसे अभी इस रूप में नहीं समझना चाहिए कि डॉक्टर बाहर से किसी व्यक्ति की कोशिकाओं की ‘सफाई’ सीधे नियंत्रित कर सकेंगे।

अभी वैज्ञानिक इस खोज को यह समझने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं कि ऑटोफैगी किस तरह काम करती है और भविष्य में इसे बीमारी से जुड़ी प्रक्रियाओं के अध्ययन या संभावित उपचार रणनीतियों में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *