आज 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि है, जो सुबह 10:15 बजे तक रहेगी। इसके बाद सप्तमी तिथि शुरू होगी। आज पितृ पक्ष के दौरान सप्तमी का श्राद्ध बताया गया है। पंचांग के अनुसार आज मृगशिरा नक्षत्र रहेगा, जबकि राहुकाल सुबह 10:58 बजे से दोपहर 12:28 बजे तक रहेगा।
2 अक्टूबर 2026 का पंचांग
- दिन: शुक्रवार
- तिथि: षष्ठी सुबह 10:15 बजे तक, इसके बाद सप्तमी
- पक्ष: कृष्ण पक्ष
- मास: आश्विन
- गुजरात-महाराष्ट्र: भाद्रपद
- विक्रम संवत: 2083 (गुजरात के अनुसार 2082)
- शक संवत: 1948
- अयन: दक्षिणायन
- ऋतु: शरद
- नक्षत्र: मृगशिरा, 3 अक्टूबर रात 2:55 बजे तक; इसके बाद आर्द्रा
- योग: व्यतीपात शाम 6:18 बजे तक, इसके बाद वरीयान
- राहुकाल: सुबह 10:58 बजे से दोपहर 12:28 बजे तक
- सूर्योदय: सुबह 6:31 बजे
- सूर्यास्त: शाम 6:24 बजे
- दिशाशूल: पश्चिम दिशा
- व्रत-पर्व: सप्तमी का श्राद्ध
षष्ठी तिथि को लेकर धार्मिक मान्यता
दिए गए पंचांग के अनुसार, ब्रह्मवैवर्त पुराण के संदर्भ में षष्ठी तिथि पर नीम की पत्ती, फल या दातुन मुंह में डालने से संबंधित एक धार्मिक मान्यता बताई गई है। यह शास्त्रीय मान्यता है, इसे वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
चतुर्मास को लेकर भी स्कंद पुराण के संदर्भ में कुछ परंपरागत नियम बताए गए हैं। इनमें तांबे और कांसे के पात्रों के स्थान पर अन्य धातुओं के पात्रों के उपयोग तथा पलाश के पत्तों की पत्तल में भोजन करने को लेकर धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख है।
पितरों के उद्धार को लेकर क्या कहती है मान्यता?
पंचांग में पद्मपुराण के संदर्भ से भगवान शिव और कार्तिकेय के संवाद का उल्लेख किया गया है। इसमें पितरों के उद्धार के लिए भगवान विष्णु की भक्ति और सेवा को महत्वपूर्ण बताया गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों के निमित्त भगवान विष्णु का दूध आदि से अभिषेक करने को भी पुण्यकारी माना गया है। ये बातें धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं पर आधारित हैं।
श्राद्ध में क्या करें?
पंचांग में पद्मपुराण, कूर्मपुराण और स्कंदपुराण के संदर्भ से श्राद्ध से जुड़े कई नियम बताए गए हैं। इनमें श्राद्ध को एकांत और श्रद्धापूर्वक करने तथा पिंडदान के दौरान शुद्धता बनाए रखने की बात कही गई है।
धार्मिक परंपरा में ब्राह्मण को आमंत्रित कर श्राद्ध करने का भी उल्लेख मिलता है। साथ ही श्राद्ध के लिए कृष्ण पक्ष और अपराह्न काल को विशेष महत्व दिए जाने की मान्यता है।
श्राद्ध के समय को लेकर मान्यताएं
पंचांग में शाम और रात के समय श्राद्ध न करने की परंपरागत मान्यता बताई गई है। दोनों संध्याओं में भी श्राद्ध से बचने का उल्लेख किया गया है।
वहीं, कुतप काल को पितरों के लिए किए गए दान के लिहाज से विशेष माना गया है। पंचांग में कुतप, खड्गपात्र, कंबल, चांदी, कुश, तिल, गौ और दौहित्र को कुतप से संबंधित आठ नामों के रूप में बताया गया है।
श्राद्ध में किन बातों का ध्यान रखें?
धार्मिक ग्रंथों के संदर्भ में पंचांग में श्राद्ध के दौरान कुछ बातों को महत्वपूर्ण बताया गया है। इनमें शुद्धता बनाए रखना, क्रोध से बचना और जल्दबाजी न करना शामिल है।
पंचांग के अनुसार, तिल, कुतप काल और दौहित्र को श्राद्ध में विशेष महत्व दिया गया है। ये सभी विवरण धार्मिक ग्रंथों और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं।
नोट: पंचांग में दिए गए धार्मिक नियम और मान्यताएं विभिन्न परंपराओं एवं ग्रंथों के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। किसी विशेष श्राद्ध कर्म के लिए स्थानीय परंपरा और विद्वान की सलाह को प्राथमिकता दी जा सकती है।

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