दिवाली केवल रोशनी और पूजा का त्योहार नहीं है, बल्कि अलग-अलग राज्यों की पारंपरिक मिठाइयों और खान-पान की संस्कृति को जानने का भी अवसर है। कहीं खील-बताशे पूजा का हिस्सा होते हैं, तो कहीं शक्करपारा, लड्डू और दूसरी घरेलू मिठाइयां त्योहार की रौनक बढ़ाती हैं। इन्हीं पारंपरिक पकवानों में शामिल है अनरसा, जिसे खास तौर पर बिहार और महाराष्ट्र में दिवाली के अवसर पर बनाया जाता है।
चावल, तिल और मिठास से तैयार होने वाली यह मिठाई स्वाद के साथ अपनी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान के लिए भी जानी जाती है। अनरसा को लेकर बिहार के गया, उत्तर प्रदेश के डमरुआ गांव और महाराष्ट्र की पारंपरिक दिवाली से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं इस मिठाई की खासियत और इससे जुड़ी परंपराओं के बारे में।
गया में अनरसा की शुरुआत होने की मान्यता
बिहार का गया जिला तिलकुट के लिए काफी प्रसिद्ध है। हालांकि, यहां की पारंपरिक मिठाइयों में अनरसा का भी खास स्थान माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, गया के टिकारी राजघराने के समय अनरसा बनाने की परंपरा को बढ़ावा मिला था। कहा जाता है कि उस दौर में राजघराने के लिए विशेष कारीगर इस मिठाई को तैयार करते थे।
अनरसा बनाने में आमतौर पर चावल का आटा, चीनी या गुड़ और तिल का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ जगहों पर इसकी अलग-अलग रेसिपी में खोया जैसी सामग्री भी शामिल की जाती है। समय के साथ इसके आकार, स्वाद और बनाने के तरीके में क्षेत्रीय बदलाव आए हैं।
हालांकि, अनरसा की शुरुआत गया में ही हुई थी, इसका कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे इस मिठाई से जुड़ी प्रचलित मान्यता के रूप में देखना अधिक उचित है।
उत्तर प्रदेश के डमरुआ गांव से भी जुड़ती है कहानी
अनरसा की उत्पत्ति को लेकर एक दूसरी मान्यता उत्तर प्रदेश के डमरुआ गांव से भी जुड़ी है। इस वजह से अलग-अलग क्षेत्रों में इस मिठाई की शुरुआत को लेकर अलग कहानियां सुनने को मिलती हैं। भारत में कई पारंपरिक व्यंजनों की तरह अनरसा की रेसिपी भी पीढ़ियों से परिवारों के बीच आगे बढ़ती रही है।
क्षेत्र के अनुसार इसकी बनावट और स्वाद में अंतर देखने को मिल सकता है। कहीं इसे गोल आकार में बनाया जाता है, तो कहीं इसके ऊपर तिल की परत होती है। यही विविधता अनरसा को अलग-अलग इलाकों की खाद्य परंपरा का हिस्सा बनाती है।
महाराष्ट्र में दिवाली के फराल का खास हिस्सा है अनरसा
महाराष्ट्र में दिवाली के दौरान घरों में कई तरह के पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं। इस खास खान-पान को स्थानीय भाषा में ‘फराल’ कहा जाता है। चकली, करंजी, लड्डू और शंकरपाली के साथ अनरसा भी कई परिवारों में बनाया जाता है।
महाराष्ट्र की परंपरा में दिवाली के दौरान तैयार किए गए पकवानों को परिवार और दोस्तों के साथ बांटने का विशेष महत्व है। अनरसा भी इसी परंपरा का हिस्सा है। कई घरों में इसे लक्ष्मी पूजा के अवसर पर नैवेद्य के रूप में अर्पित किया जाता है। इस तरह यह मिठाई केवल स्वाद तक सीमित नहीं रहती, बल्कि त्योहार की धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं से भी जुड़ जाती है।
भगवान शिव से जुड़ी धार्मिक मान्यता
अनरसा को लेकर कुछ धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की साधना और भगवान शिव को प्रसन्न करने की कथा के साथ इस मिठाई का संबंध बताया जाता है। हालांकि, इस कथा की ऐतिहासिक या प्रामाणिक धार्मिक पुष्टि स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे लोकमान्यता के रूप में ही समझना चाहिए।
अनरसा केवल दिवाली ही नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में अन्य त्योहारों और शुभ अवसरों पर भी बनाया जाता है। बिहार में छठ जैसे पर्वों के दौरान पारंपरिक पकवानों का विशेष महत्व है, जबकि महाराष्ट्र में दिवाली के फराल की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं।
स्वाद के साथ परंपरा का भी प्रतीक है अनरसा
अनरसा की खासियत यह है कि इसकी पहचान किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। बिहार के गया से जुड़ी मान्यताएं, उत्तर प्रदेश के डमरुआ गांव की कहानी और महाराष्ट्र के दिवाली फराल में इसकी मौजूदगी इस मिठाई को सांस्कृतिक रूप से खास बनाती है।
हालांकि, इसकी वास्तविक उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि अनरसा लंबे समय से पारंपरिक भारतीय मिठाइयों में अपनी जगह बनाए हुए है। दिवाली पर इसे बनाना, पूजा में अर्पित करना और परिवार के लोगों के साथ बांटना इस मिठाई को स्वाद से आगे बढ़कर त्योहार की यादों और परंपराओं से जोड़ देता है।
