आज का पंचांग, रविवारी सप्तमी और कालाष्टमी का संयोग, जानें राहुकाल

1 नवंबर 2026 के पंचांग में तिथि, नक्षत्र, राहुकाल और रविपुष्य योग की जानकारी 1 नवंबर 2026 का पंचांग और धनतेरस पर यम दीपदान की विधि
रविवार, 1 नवंबर 2026 को कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि है। आज रविवारी सप्तमी, कालाष्टमी और रविपुष्य योग का संयोग बन रहा है। सप्तमी तिथि दोपहर 2 बजकर 51 मिनट तक रहेगी, इसके बाद अष्टमी तिथि शुरू होगी। वहीं राहुकाल शाम 4:38 बजे से 6:03 बजे तक रहेगा।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज का दिन पूजा-पाठ और व्रत के लिहाज से विशेष है। आइए जानते हैं 1 नवंबर का पंचांग, शुभ-अशुभ समय और आने वाले धनतेरस पर किए जाने वाले यम दीपदान की विधि।

1 नवंबर 2026 का पंचांग

  • दिन: रविवार

  • विक्रम संवत: 2083

  • शक संवत: 1948

  • अयन: दक्षिणायन

  • ऋतु: हेमंत

  • मास: कार्तिक

  • पक्ष: कृष्ण पक्ष

  • तिथि: सप्तमी दोपहर 2:51 बजे तक, इसके बाद अष्टमी

  • नक्षत्र: पुष्य, 2 नवंबर सुबह 4:30 बजे तक; इसके बाद अश्लेषा

  • योग: साध्य दोपहर 2:39 बजे तक, इसके बाद शुभ

  • सूर्योदय: सुबह 6:42 बजे

  • सूर्यास्त: शाम 6:01 बजे

  • राहुकाल: शाम 4:38 से 6:03 बजे तक

  • दिशाशूल: पश्चिम दिशा

आज के व्रत और पर्व

1 नवंबर को रविवारी सप्तमी और कालाष्टमी का पर्व है। इसके साथ ही रविपुष्य योग भी बन रहा है, जो 2 नवंबर सुबह 4:30 बजे तक रहेगा। पंचांग के अनुसार रविवारी सप्तमी का समय सूर्योदय से दोपहर 2:51 बजे तक है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्तमी तिथि पर कुछ विशेष खाद्य पदार्थों के सेवन से बचने की सलाह दी जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के उल्लेख के आधार पर इस दिन ताड़ का फल खाने से परहेज करने की बात कही गई है।

चतुर्मास से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं

धार्मिक ग्रंथों में चतुर्मास के दौरान खानपान और दिनचर्या से जुड़े कुछ नियम बताए गए हैं। स्कंद पुराण के अनुसार इस अवधि में तांबे और कांसे के पात्रों के स्थान पर अन्य धातुओं के बर्तनों का उपयोग करने की मान्यता है।

इसके अलावा चतुर्मास में पलाश के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना भी धार्मिक दृष्टि से पुण्यदायी माना गया है।

धनतेरस पर 6 नवंबर को होगा यम दीपदान

धनतेरस का पर्व 6 नवंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन यमराज के निमित्त घर के बाहर दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे यम दीपदान कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि धनतेरस की शाम यम दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार की मंगलकामना की जाती है।

स्कंद पुराण में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को शाम के समय घर के बाहर यमराज के लिए दीप जलाने का उल्लेख मिलता है। पद्म पुराण में भी इस परंपरा का वर्णन किया गया है।

यम दीपदान की सरल विधि

धार्मिक परंपरा के अनुसार यम दीपदान प्रदोषकाल में करना चाहिए। इसके लिए इन बातों का ध्यान रखा जाता है:

  1. सबसे पहले गेहूं के आटे से एक बड़ा दीपक तैयार करें।

  2. स्वच्छ रूई की दो लंबी बत्तियां बनाकर उन्हें दीपक में एक-दूसरे के ऊपर आड़ी रखें, ताकि चारों दिशाओं में बत्ती के चार मुंह दिखाई दें।

  3. दीपक में तिल का तेल डालें और कुछ काले तिल भी मिलाएं।

  4. रोली, अक्षत और फूल से दीपक का पूजन करें।

  5. घर के मुख्य दरवाजे के बाहर खील या गेहूं की छोटी ढेरी बनाकर उस पर दीपक रखें।

  6. दीपक जलाकर दक्षिण दिशा की ओर रखें और ‘ॐ यमदेवाय नमः’ मंत्र का जाप करते हुए नमस्कार करें।

यम दीपदान का मंत्र और अर्थ

धनतेरस पर यम दीपदान करते समय इस मंत्र का जाप करने की धार्मिक परंपरा है:

मंत्र:

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥

मंत्र का अर्थ:

इस मंत्र में सूर्यपुत्र यमदेव से प्रार्थना की जाती है कि वे दीपदान से प्रसन्न हों और मृत्यु के भय से रक्षा कर परिवार का कल्याण करें।

धनतेरस पर यम दीपदान को हिंदू धर्म की एक प्राचीन परंपरा माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन विधि-विधान से दीप जलाकर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं।

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