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कभी ‘नॉटी बॉय’ कहलाने वाला रॉकेट कैसे बना ISRO का ‘स्मार्ट बॉय’

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 30 अक्टूबर की रात GSLV-F18 रॉकेट के जरिए NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट का सफल प्रक्षेपण किया। इस मिशन के साथ GSLV ने अपने प्रक्षेपण का 20वां पड़ाव पूरा किया। रॉकेट ने उपग्रह को निर्धारित कक्षा में सटीकता के साथ स्थापित किया।

आज जिस GSLV की सटीकता की चर्चा हो रही है, कभी इसी रॉकेट को ISRO का ‘नॉटी बॉय’ कहा जाता था। शुरुआती मिशनों में बार-बार सामने आई तकनीकी समस्याओं और असफलताओं ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे। खास तौर पर तीसरे चरण में इस्तेमाल होने वाली क्रायोजेनिक इंजन तकनीक वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती साबित हुई।

हालांकि, लगातार परीक्षण, तकनीकी सुधार और इंजीनियरों के प्रयासों से GSLV की क्षमता में बदलाव आया। यही वजह है कि कभी अनिश्चित प्रदर्शन के लिए पहचाने जाने वाले इस रॉकेट को अब ‘स्मार्ट बॉय’ के रूप में भी देखा जाने लगा है। आइए जानते हैं GSLV की शुरुआती चुनौतियों से लेकर इसकी सफलता तक की पूरी कहानी।

आखिर क्यों पड़ा GSLV का नाम ‘नॉटी बॉय’?

GSLV के शुरुआती सफर में कई ऐसी तकनीकी चुनौतियां सामने आईं, जिनके कारण इसके प्रक्षेपण को लेकर वैज्ञानिकों में अनिश्चितता बनी रहती थी। शुरुआती 20 प्रक्षेपणों में से छह मिशन पूरी तरह या आंशिक रूप से असफल रहे थे। इसकी तुलना में ISRO का PSLV रॉकेट अधिक भरोसेमंद प्रदर्शन के लिए जाना जाता था।

PSLV के मुकाबले GSLV के प्रदर्शन में शुरुआती दौर में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिले। कई बार मिशन के अंतिम चरण तक यह स्पष्ट नहीं होता था कि रॉकेट उपग्रह को निर्धारित कक्षा में पहुंचा पाएगा या नहीं। इसी अप्रत्याशित व्यवहार के चलते इसे ‘नॉटी बॉय’ का नाम दिया गया।

क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक बनी सबसे बड़ी चुनौती

GSLV की शुरुआती असफलताओं की प्रमुख वजह इसके तीसरे चरण यानी क्रायोजेनिक अपर स्टेज से जुड़ी तकनीकी चुनौतियां थीं। क्रायोजेनिक इंजन अंतरिक्ष तकनीक की जटिल प्रणालियों में से एक है। इसमें बेहद कम तापमान पर रखे गए तरल ऑक्सीजन और तरल हाइड्रोजन का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जाता है।

भारत के लिए इस तकनीक को विकसित करना आसान नहीं था। नब्बे के दशक में प्रतिबंधों और रूस की ओर से तकनीक साझा करने में पीछे हटने के बाद भारत ने स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक विकसित करने का रास्ता चुना।

शुरुआती दौर में इग्निशन और दबाव के संतुलन जैसी समस्याओं ने वैज्ञानिकों के सामने मुश्किलें खड़ी कीं। इन तकनीकी खामियों के कारण रॉकेट के उड़ान पथ पर असर पड़ता था और कई बार उपग्रह को अपेक्षित कक्षा में स्थापित करने में परेशानी आती थी।

लगातार तकनीकी सुधारों से बदली रॉकेट की क्षमता

GSLV की शुरुआती असफलताओं के बावजूद ISRO के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने प्रयास जारी रखे। क्रायोजेनिक इंजन के नोजल डिजाइन, ईंधन प्रवाह, थ्रस्ट कंट्रोल और एवियोनिक्स जैसी प्रणालियों में लगातार सुधार किए गए।

साल 2014 के बाद स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन CE-7.5 की स्थिरता में महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया। लगातार परीक्षणों और डेटा विश्लेषण के जरिए तकनीकी कमियों को दूर करने पर काम हुआ। इन प्रयासों का असर रॉकेट के प्रदर्शन और उसकी विश्वसनीयता पर दिखाई देने लगा।

‘नॉटी बॉय’ से ‘स्मार्ट बॉय’ बनने तक का सफर

तकनीकी सुधारों और सफल मिशनों ने GSLV की पुरानी छवि को बदलने में अहम भूमिका निभाई। शुरुआती दौर में जिस रॉकेट के प्रक्षेपण को लेकर अनिश्चितता बनी रहती थी, उसने बाद के वर्षों में कई महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशनों में अपनी क्षमता दिखाई।

भारत और अमेरिका के संयुक्त NISAR अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट के प्रक्षेपण और अब NVS-03 को निर्धारित कक्षा में स्थापित करने जैसे मिशनों के साथ GSLV ने अपनी तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया है। इसी बदले हुए प्रदर्शन के कारण इसे ‘नॉटी बॉय’ से ‘स्मार्ट बॉय’ बनने की कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है।

ISRO प्रमुख ने बताया दुनिया के सबसे सटीक प्रक्षेपणों में से एक

NVS-03 के हालिया सफल प्रक्षेपण के बाद ISRO प्रमुख डॉ. वी. नारायणन ने मिशन की सटीकता की सराहना की। उनके मुताबिक, GSLV का यह प्रक्षेपण दुनिया के किसी भी रॉकेट द्वारा किए गए सबसे सटीक प्रक्षेपणों में से एक था।

दिए गए विवरण के अनुसार, रॉकेट ने उपग्रह को तय दीर्घवृत्ताकार कक्षा में बेहद सटीकता से स्थापित किया और कक्षा में विचलन एक मिलीमीटर तक नहीं रहा।

GSLV का यह सफर दिखाता है कि शुरुआती तकनीकी चुनौतियों के बावजूद निरंतर अनुसंधान, परीक्षण और सुधार से किसी अंतरिक्ष प्रणाली की क्षमता को किस तरह विकसित किया जा सकता है। कभी ‘नॉटी बॉय’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस रॉकेट ने अपनी बदलती तकनीकी क्षमता के साथ ISRO के अंतरिक्ष अभियानों में अहम भूमिका हासिल की है।

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