ये है भीतर रैनी की परंपरा
बस्तर दशहरा करीब 75 दिनों तक चलने वाले आयोजनों के लिए जाना जाता है। इसकी प्रमुख रस्मों में भीतर रैनी का विशेष स्थान है। इस दौरान आदिवासी ग्रामीण पारंपरिक तरीके से तैयार किए गए आठ पहियों वाले विशाल रथ को खींचते हैं। आधी रात को रथ को जगदलपुर स्थित दंतेश्वरी मंदिर से लगभग चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में ले जाया जाता है। इस रस्म को प्रतीकात्मक रूप से रथ चोरी की परंपरा भी कहा जाता है।
राजा और ग्रामीणों के बीच असंतोष से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय परंपरा के अनुसार, राजशाही के दौर में राजा से नाराज माड़िया समुदाय के लोगों ने रथ को अपने कब्जे में लेकर एक स्थान पर छिपा दिया था। इसके बाद राजा विजयादशमी के अगले दिन कुम्हड़ाकोट पहुंचे और ग्रामीणों को मनाने का प्रयास किया।
मान्यता है कि ग्रामीणों के साथ नए चावल से बनी खीर खाने की रस्म ‘नवा खानी’ निभाने के बाद रथ को वापस जगदलपुर लाया गया। इसी परंपरा से जुड़ी वापसी की रस्म को ‘बाहर रैनी’ कहा जाता है। यह प्रसंग बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और राजपरिवार तथा आदिवासी समुदाय के ऐतिहासिक संबंधों से जुड़ा माना जाता है।
बाहर रैनी में वापस आएगा विशाल रथ
भीतर रैनी के बाद गुरुवार को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के कुम्हड़ाकोट पहुंचने का कार्यक्रम है। परंपरा के अनुसार, यहां ग्रामीणों के साथ नवा खानी की रस्म निभाई जाएगी। इसके बाद विशाल रथ को करीब चार किलोमीटर खींचकर वापस मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में लाया जाएगा।
हजारों लोग बनते हैं परंपरा के साक्षी
भीतर रैनी और बाहर रैनी के दौरान बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण, श्रद्धालु और पर्यटक जुटते हैं। रथ को खींचकर मंदिर तक वापस लाना इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहता है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक भागीदारी को दर्शाती है।
बस्तर दशहरा की ये रस्में केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास, लोकविश्वास और आदिवासी परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति भी हैं।
