अप्रैल में बाघिन और चार शावकों की मौत के बाद शुरू हुआ टीकाकरण
जानकारी के अनुसार, 21 अप्रैल 2026 को कान्हा के सरही क्षेत्र में एक बाघ शावक की मौत के बाद संक्रमण के संभावित प्रसार को रोकने के लिए टाइगर रिजर्व से लगे 167 गांवों में करीब तीन हजार आवारा कुत्तों का टीकाकरण कराया गया। लगभग एक महीने बाद कुत्तों को बूस्टर डोज भी दी गई।
इसके बावजूद 6 अक्टूबर को कान्हा के मुक्की क्षेत्र के वन्यप्राणी उपचार केंद्र में एक बाघिन की मौत हो गई। इस बाघिन में CDV संक्रमण के लक्षण पाए गए थे। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, उसका पोस्टमार्टम किया गया और जैविक नमूने जांच के लिए जबलपुर की प्रयोगशाला भेजे गए।
छोटे मांसाहारी वन्यजीवों की जांच पर जोर
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस कुत्तों सहित कई मांसाहारी प्राणियों को संक्रमित कर सकता है। ऐसे में जंगल में रहने वाले छोटे मांसाहारी वन्यजीवों की भूमिका की जांच करना संक्रमण के संभावित स्रोत का पता लगाने में मददगार हो सकता है।
डॉ. अवध बिहारी श्रीवास्तव के हवाले से दी गई जानकारी के मुताबिक, संक्रमण के स्रोत की पहचान के लिए जंगल के भीतर विशेष वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरत है। हालांकि, छोटे मांसाहारी जीवों में वायरस की मौजूदगी को लेकर कोई पुष्ट जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है।
जिस क्षेत्र में पहले हुई थीं मौतें, वहां संक्रमण का खतरा
खबर के अनुसार, अप्रैल में जिस क्षेत्र में एक बाघिन और उसके चार शावकों की मौत हुई थी, वहां करीब 50 बाघ सक्रिय बताए गए हैं। इस वजह से उस इलाके में संक्रमण की निगरानी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संबंधित क्षेत्र के बाघों के नमूनों की रिपोर्ट निगेटिव आने की जानकारी भी दी गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संक्रमण के स्रोत को समझने के लिए केवल बाघों ही नहीं, बल्कि संभावित वाहक प्रजातियों और उनके संपर्क में आने वाले वन्यजीवों की भी वैज्ञानिक जांच जरूरी हो सकती है।
कान्हा की निवासी नहीं थी अक्टूबर में मृत बाघिन
6 अक्टूबर को मृत मिली बाघिन के संबंध में बताया गया कि वह कान्हा की स्थायी निवासी नहीं थी और बालाघाट की दिशा से यहां पहुंची थी। वन विभाग के अनुसार, उसे 26 अगस्त को कमजोर हालत में देखा गया था और 27 अगस्त से उसका उपचार चल रहा था। मौत के बाद नमूने जांच के लिए भेजे गए।
संक्रमण के वास्तविक स्रोत का पता लगाना जरूरी
कान्हा में बाघों की मौतों के बाद संक्रमण की रोकथाम और उसके स्रोत की पहचान वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हो गई है। गांवों के कुत्तों के टीकाकरण के साथ-साथ संभावित वाहक वन्यजीवों की निगरानी और वैज्ञानिक जांच से संक्रमण के प्रसार को समझने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल, जंगल के भीतर वायरस के स्रोत की आशंका की पुष्टि नहीं हुई है। संक्रमण की वास्तविक वजह और संभावित वाहक प्रजातियों की भूमिका स्पष्ट होने के लिए जांच रिपोर्ट और आगे के वैज्ञानिक अध्ययन का इंतजार है।
