Headlines

कचरे के साथ अंतरिक्ष से लौटेंगे 12 कैप्सूल, हीट शील्ड तकनीक का होगा परीक्षण

NASA के KREPE-3 प्रयोग में अंतरिक्ष यान से पृथ्वी के वायुमंडल में वापसी के दौरान हीट शील्ड सामग्री की जांच के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले छोटे प्रायोगिक कैप्सूल NASA के KREPE-3 प्रयोग में अंतरिक्ष यान से पृथ्वी के वायुमंडल में वापसी के दौरान हीट शील्ड सामग्री की जांच के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले छोटे प्रायोगिक कैप्सूल
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA भविष्य के चंद्रमा और मंगल मिशनों में अंतरिक्ष यात्रियों तथा उपकरणों को अत्यधिक गर्मी से बचाने के लिए नई हीट शील्ड तकनीकों का परीक्षण कर रही है। इसके लिए एजेंसी ने एक अनोखा तरीका अपनाया है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से लौटने वाले कार्गो अंतरिक्ष यान के साथ 12 छोटे प्रायोगिक कैप्सूल भेजे गए हैं, जिनकी मदद से अलग-अलग ताप-सुरक्षा सामग्रियों के प्रदर्शन का अध्ययन किया जाएगा।

इस प्रयोग का नाम Kentucky Reentry Probe Experiment-3 (KREPE-3) है। इसका उद्देश्य पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश के दौरान पैदा होने वाली अत्यधिक गर्मी और दबाव जैसी परिस्थितियों में नई हीट शील्ड तकनीकों की क्षमता को समझना है। यह प्रयोग पहले के KREPE मिशनों की अगली कड़ी है और अपेक्षाकृत कम लागत में महत्वपूर्ण अंतरिक्ष संबंधी आंकड़े जुटाने के लिए तैयार किया गया है।

अंतरिक्ष के कचरे से जुटाया जाएगा अहम डेटा

KREPE-3 प्रयोग में इस्तेमाल किए जा रहे कैप्सूल को यूनिवर्सिटी ऑफ केंटकी के छात्रों ने डिजाइन किया है। इन्हें नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन के Cygnus XL कार्गो अंतरिक्ष यान के भीतर रखा गया था। अंतरिक्ष स्टेशन से रवाना होने से पहले अंतरिक्ष यात्रियों ने यान में कचरा भरा और प्रयोग के लिए कैप्सूल सक्रिय किए।

योजना के अनुसार, पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय कार्गो यान टूटेगा और छोटे कैप्सूल अलग होकर आंकड़े जुटाएंगे। इन कैप्सूल में तापमान, दबाव, गति, चुंबकीय क्षेत्र और प्रकाश को मापने वाले सेंसर लगे हैं। उपग्रह संकेतों के माध्यम से एकत्रित डेटा शोधकर्ताओं तक पहुंचाया जाएगा।

पुरानी और नई हीट शील्ड सामग्री की होगी तुलना

प्रयोग में कई तरह की ताप-सुरक्षा सामग्रियों को शामिल किया गया है। इनमें स्पेस शटल में इस्तेमाल की गई सिरेमिक टाइल जैसी पहले से प्रमाणित तकनीक के साथ नई सामग्री और डिजाइन भी शामिल हैं।

NASA के जॉनसन स्पेस सेंटर और ओक रिज नेशनल लैबोरेटरी की ओर से विकसित 3D-प्रिंटेड हीट शील्ड तकनीक का भी परीक्षण किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह समझना है कि एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग यानी 3D प्रिंटिंग से बनाई गई सामग्री अंतरिक्ष यान की वापसी के दौरान कितनी प्रभावी साबित हो सकती है।

मंगल मिशन के लिए हल्की सामग्री पर फोकस

NASA के एम्स रिसर्च सेंटर की ओर से MERINO नामक ताप-सुरक्षा सामग्री भी इस प्रयोग में शामिल की गई है। इसका पूरा नाम Materials Engineered for Re-entry using Innovative Needling Operations है।

यह सामग्री कार्बन और फिनोलिक फाइबर की कई परतों को सिलकर बनाई जाती है। पारंपरिक ताप-सुरक्षा सामग्रियों की तुलना में इसे अधिक लचीला, तेजी से तैयार होने वाला और कम खर्चीला विकल्प बनाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है।

मंगल ग्रह के लिए ऐसे हल्के सुरक्षा कवच उपयोगी हो सकते हैं, क्योंकि वहां का वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में काफी पतला है। हालांकि, मंगल पर उतरने वाले अंतरिक्ष यान को भी वायुमंडल में प्रवेश के दौरान गर्मी से बचाव की जरूरत होती है। नई सामग्री का परीक्षण यह निर्धारित करने में मदद करेगा कि वह इन परिस्थितियों में कितनी कारगर है।

विशेष आकार वाले कैप्सूल भी करेंगे परीक्षण

KREPE-3 में केवल नई सामग्री ही नहीं, बल्कि हीट शील्ड के आकार और डिजाइन का भी परीक्षण किया जा रहा है। एक प्रयोगात्मक कैप्सूल में दो शंकु जैसी संरचनाओं का इस्तेमाल किया गया है। इसमें टंगस्टन की नोक, कार्बन और ताप-प्रतिरोधी फाइबर की परतें तथा MERINO सामग्री शामिल हैं।

इस डिजाइन से कंप्यूटर मॉडल द्वारा की गई गणनाओं की तुलना वास्तविक उड़ान से मिले आंकड़ों से की जा सकेगी। इससे भविष्य में अंतरिक्ष यानों के आकार और वायुमंडल में प्रवेश के दौरान उनकी स्थिरता का बेहतर आकलन करने में मदद मिलेगी।

छाते की तरह खुलने वाली हीट शील्ड का भी परीक्षण

प्रयोग में एक ऐसे हीट शील्ड डिजाइन को भी शामिल किया गया है, जिसे जरूरत के अनुसार फैलाया जा सकता है। Adaptable Deployable Entry and Placement Technology नामक यह प्रणाली छाते जैसी संरचना का इस्तेमाल करती है।

सतह का क्षेत्रफल बढ़ने से वायुमंडल में उतरते समय गति कम करने में मदद मिल सकती है। बड़े आकार में विकसित होने पर इस तरह की हीट शील्ड को मोड़कर रॉकेट में रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर फैलाया जा सकता है। इससे ऐसे बड़े पेलोड को अंतरिक्ष में भेजने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, जिनका आकार उन्हें ले जाने वाले रॉकेट से भी बड़ा हो।

कई संस्थान मिलकर कर रहे हैं काम

KREPE-3 प्रयोग में यूनिवर्सिटी ऑफ केंटकी, केंटकी राज्य, NASA का Established Program to Stimulate Competitive Research (EPSCoR), NASA के विभिन्न केंद्र और अन्य सरकारी तथा निजी भागीदार शामिल हैं।

NASA के EPSCoR कार्यक्रम के प्रबंधक डेविड बर्जर के अनुसार, यह परियोजना विद्यार्थियों और युवा वैज्ञानिकों को ऐसे प्रयोगों पर काम करने का अवसर देती है, जो उनकी शिक्षा के साथ NASA के अंतरिक्ष अभियानों के लक्ष्यों में भी योगदान दे सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *