इलेक्ट्रिक वाहनों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। कम रनिंग कॉस्ट, शांत ड्राइविंग और पर्यावरण के लिहाज से बेहतर विकल्प होने के कारण बड़ी संख्या में लोग अब पेट्रोल-डीजल कारों के बजाय EV खरीदने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, कार खरीदते समय सिर्फ एक्स-शोरूम कीमत, चार्जिंग कॉस्ट और माइलेज देखना ही पर्याप्त नहीं है।
कार की कुल ओनरशिप कॉस्ट में हर साल चुकाया जाने वाला व्हीकल इंश्योरेंस प्रीमियम भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। खासकर पहली बार EV खरीदने वाले ग्राहकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इलेक्ट्रिक कारों का कॉम्प्रिहेंसिव या ओन-डैमेज इंश्योरेंस कई मामलों में समान श्रेणी की पेट्रोल-डीजल कारों की तुलना में महंगा पड़ सकता है।
थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की दरें नियामकीय ढांचे के तहत तय होती हैं, इसलिए बड़ा अंतर मुख्य रूप से ओन-डैमेज या कॉम्प्रिहेंसिव कवर में देखने को मिल सकता है।
1. ज्यादा कीमत और हाई IDV
EV की कीमत पर इंश्योरेंस प्रीमियम का सीधा असर पड़ता है। इलेक्ट्रिक कारों में महंगी बैटरी, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-टेक कंपोनेंट्स इस्तेमाल होते हैं, जिसकी वजह से कई EV मॉडल की कीमत उनके पेट्रोल या डीजल समकक्षों से ज्यादा हो सकती है।
इंश्योरेंस में IDV यानी Insured Declared Value महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह वह अधिकतम रकम होती है, जिसके आधार पर चोरी या कार के पूरी तरह क्षतिग्रस्त होने जैसी स्थिति में बीमा कवरेज तय होता है। आम तौर पर IDV जितनी ज्यादा होगी, प्रीमियम भी उतना अधिक हो सकता है।
2. महंगा बैटरी पैक बढ़ाता है रिस्क
इलेक्ट्रिक कार की सबसे महंगी और महत्वपूर्ण चीजों में उसकी लिथियम-आयन बैटरी शामिल है। बैटरी पैक की कीमत वाहन की कुल लागत में बड़ा हिस्सा हो सकती है।
अगर किसी गंभीर दुर्घटना, पानी से नुकसान या अन्य कारण से बैटरी पैक को नुकसान पहुंचता है और उसे बदलने की जरूरत पड़ती है, तो रिपेयर या रिप्लेसमेंट का खर्च काफी ज्यादा हो सकता है।
बीमा कंपनियां संभावित क्लेम की लागत और जोखिम को ध्यान में रखकर प्रीमियम तय करती हैं। यही वजह है कि बैटरी से जुड़े संभावित नुकसान का असर EV के इंश्योरेंस प्रीमियम पर पड़ सकता है।
3. EV की रिपेयरिंग और पार्ट्स महंगे
पेट्रोल और डीजल वाहनों के लिए स्पेयर पार्ट्स और रिपेयर नेटवर्क लंबे समय से विकसित हैं। इसके मुकाबले EV में इस्तेमाल होने वाले हाई-वोल्टेज कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सेंसर और बैटरी से जुड़े हिस्से महंगे हो सकते हैं।
किसी दुर्घटना के बाद इलेक्ट्रिक कार की मरम्मत में छोटे पार्ट की जगह पूरा मॉड्यूल या असेंबली बदलने की जरूरत पड़ सकती है। इससे क्लेम की कुल लागत बढ़ सकती है और इसका असर इंश्योरेंस प्रीमियम पर भी पड़ सकता है।
4. प्रशिक्षित टेक्नीशियन और सर्विस नेटवर्क की जरूरत
पेट्रोल-डीजल कारों की तुलना में इलेक्ट्रिक वाहनों की सर्विसिंग के लिए अलग तरह की ट्रेनिंग और उपकरणों की जरूरत होती है। हाई-वोल्टेज सिस्टम पर काम करने के लिए प्रशिक्षित तकनीशियन जरूरी होते हैं।
EV का सर्विस नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है, लेकिन कई जगहों पर अभी भी पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में विशेषज्ञ तकनीशियनों और विशेष सर्विस सुविधाओं की उपलब्धता कम है। इससे कुछ मामलों में मरम्मत का समय और लागत बढ़ सकती है।
क्या भविष्य में EV इंश्योरेंस सस्ता हो सकता है?
EV बाजार के विस्तार के साथ स्थिति में बदलाव की संभावना है। जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री बढ़ेगी, बीमा कंपनियों के पास इनके क्लेम और दुर्घटनाओं से जुड़ा ज्यादा डेटा उपलब्ध होगा। इससे जोखिम का बेहतर आकलन करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा देश में बैटरी और EV कंपोनेंट्स का स्थानीय उत्पादन बढ़ने से भविष्य में कुछ पार्ट्स और रिपेयर की लागत कम हो सकती है। सर्विस नेटवर्क और प्रशिक्षित तकनीशियनों की संख्या बढ़ने से भी मरम्मत का खर्च नियंत्रित होने की उम्मीद है।
EV खरीदते समय इंश्योरेंस को भी बजट में रखें
अगर आप इलेक्ट्रिक कार खरीदने की योजना बना रहे हैं तो केवल कार की कीमत और चार्जिंग खर्च की तुलना न करें। इंश्योरेंस प्रीमियम, बैटरी कवरेज, डिडक्टिबल, ऐड-ऑन और पॉलिसी में शामिल शर्तों को भी ध्यान से देखें।
